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    स्ट्रेट

    बुधवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ा, तीन कार्गो जहाजों पर प्रोजेक्टाइल हमला के आसपास तीन जहाजों पर हमले की घटनाएं सामने आईं। इन हमलों में दो बड़े मालवाहक जहाजों में आग लग गई, जिससे इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अफरा-तफरी मच गई। यह रास्ता पहले से ही भारी जहाज यातायात का सामना कर रहा था और ताजा घटनाओं के बाद जहाजों की आवाजाही और कठिन हो गई है। United Kingdom Maritime Trade Operations ने बताया कि इन जहाजों को अज्ञात प्रक्षेपास्त्रों से निशाना बनाया गया।

    रिपोर्ट के अनुसार एक मालवाहक जहाज से प्रक्षेपास्त्र टकराने के बाद उसमें आग लग गई और जहाज धधकने लगा। यह घटना उस संकरे समुद्री मार्ग पर हुई जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल गुजरता है। इस क्षेत्र की कुल चौड़ाई लगभग 33 किलोमीटर है, लेकिन जहाजों के लिए उपयोगी मार्ग केवल करीब 11 किलोमीटर का है। समुद्र के बाकी हिस्सों की गहराई कम होने के कारण बड़े जहाजों का गुजरना पहले से ही जोखिम भरा माना जाता है।

    पहला हमला उस समय हुआ जब United States Navy ने कथित रूप से ईरान से जुड़े एक समुद्री बारूदी सुरंग बिछाने वाले जहाज को निशाना बनाया। इसके बाद ओमान के उत्तर में एक मालवाहक जहाज पर हमला हुआ। हमले के बाद जहाज के चालक दल को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, लेकिन जहाज का माल समुद्र में जलता रहा। Iran ने इस हमले की जिम्मेदारी तुरंत स्वीकार नहीं की, हालांकि क्षेत्र में तनाव पहले से बढ़ा हुआ है।

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    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन मालवाहक जहाज निशाने पर, वैश्विक तेल सप्लाई पर खतरा

    दूसरी घटना 11 मार्च 2026 की सुबह हुई जब रास अल खैमा से लगभग 46 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में एक कंटेनर जहाज पर प्रक्षेपास्त्र से हमला किया गया। जहाज के कप्तान ने नुकसान की सूचना दी, हालांकि सभी चालक दल के सदस्य सुरक्षित रहे। इसी दिन दुबई से लगभग 93 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में एक थोक मालवाहक जहाज पर भी हमला हुआ, जिससे जहाज को नुकसान पहुंचा। अधिकारियों ने इस क्षेत्र में जहाजों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है।

    इन हमलों के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। कई बीमा कंपनियों ने युद्ध जोखिम सुरक्षा बंद कर दी है और बड़ी जहाजरानी कंपनियों ने अपने संचालन सीमित कर दिए हैं। इससे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और कुवैत जैसे देशों के तेल निर्यात में बाधा आ सकती है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो एशिया, यूरोप और भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों में आपूर्ति संकट और कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

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