माइकल देबब्रत पात्रा ने भारत के लिए एक ट्रिलियन डॉलर विदेशी मुद्रा भंडार आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि मजबूत आर्थिक स्थिति हासिल करने के लिए भंडार बढ़ाना बेहद जरूरी साबित होता है। वर्तमान में भारत के पास लगभग 690 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध है अभी। इसलिए भारत को लक्ष्य तक पहुंचने के लिए लगभग 310 अरब डॉलर अतिरिक्त जोड़ने होंगे तुरंत। पात्रा ने बाजार संवेदनशीलता के आधार पर भंडार को सुरक्षा कवच बताया महत्वपूर्ण रूप से। उन्होंने स्पष्ट किया कि पर्याप्त भंडार निवेशकों के भरोसे और स्थिरता दोनों को मजबूत करता है। इसके अलावा पात्रा ने एक ट्रिलियन डॉलर लक्ष्य को दो प्रमुख सुरक्षा कवच बताया। उन्होंने कहा कि 350 अरब डॉलर एक वर्ष के विदेशी कर्ज भुगतान को कवर करते हैं।
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विदेशी मुद्रा दबाव और डॉलर का वैश्विक प्रभाव
बाकी 650 अरब डॉलर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश निकासी से सुरक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक होते हैं। उन्होंने लिखा कि पूंजी निकासी कई वर्षों तक चलने वाली प्रक्रिया बन सकती है अक्सर। भारत ने 2022-23 के बाद इस तरह की निकासी दबाव का अनुभव पहले ही किया। हालांकि, आरबीआई ने हाल के हफ्तों में मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप बढ़ा दिया है। इसलिए उन्होंने लगभग 600 से 650 अरब डॉलर सुरक्षा बफर को जरूरी बताया लगातार। ईरान युद्ध और तेल कीमतों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव तेजी से बढ़ाया है। इसके कारण रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिरकर 95 रुपये प्रति डॉलर पार कर गया। रुपए में गिरावट से आयात लागत और महंगाई दबाव दोनों और बढ़ने लगे हैं। इसी बीच चीन जैसे देशों के पास दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है।
डॉलर का वैश्विक दबदबा कई देशों को बड़े भंडार रखने के लिए मजबूर करता है। इसके अलावा, अमेरिका को विदेशी मुद्रा भंडार रखने की पारंपरिक आवश्यकता नहीं पड़ती है। क्योंकि अमेरिका अपनी मुद्रा डॉलर स्वयं जारी करता है और वैश्विक व्यापार में उपयोग करता है। भारत जैसे देश निर्यात से डॉलर कमाते हैं और आयात में अधिक खर्च करते हैं लगातार। दुनिया के अधिकांश देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर, यूरो और युआन का उपयोग करते हैं। इसलिए व्यापार घाटा विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा दबाव डालता है और असंतुलन बढ़ाता है। नतीजतन मजबूत निर्यात नीति और कम आयात निर्भरता भंडार स्थिरता के लिए जरूरी बनती है।
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