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    न ग्लेशियर झील फटी, न आया भूकंप… नेपाल त्रासदी की वजह को लेकर सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई

    नेपाल

    नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ को लेकर अब एक नई थ्योरी सामने आई है। शुरुआती जांच में लोगों ने इसे ग्लेशियर झील फटने यानी GLOF से जोड़कर देखा था। हालांकि, बाद की जानकारी में तिब्बत में किसी ग्लेशियर झील के फटने की पुष्टि नहीं हुई। नेपाल सेंटर फॉर डिजास्टर मैनेजमेंट के अध्यक्ष विशाल नाथ उप्रेती ने भी इस संभावना पर सवाल उठाए हैं। वैज्ञानिक अब इस आपदा की असली वजह समझने के लिए नए सिरे से जांच कर रहे हैं।

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    ग्लेशियर झील और भूकंप की थ्योरी पर सवाल

    शुरुआत में विशेषज्ञों ने माना कि ग्लेशियर झील के फटने से अचानक बाढ़ आई होगी। जब इस दावे की पुष्टि नहीं हुई, तो भूकंप को संभावित कारण माना जाने लगा। हालांकि, अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) की जानकारी ने इस संभावना को भी अलग दिशा दे दी। रिपोर्ट के अनुसार, बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर गिरने से भूकंपीय हलचल पैदा हुई। यानी भूकंप बाढ़ का कारण नहीं, बल्कि चट्टानों और बर्फ के गिरने का परिणाम हो सकता है।

    घटना के कुछ समय बाद इलाके में एक और बड़ा भूस्खलन हुआ। इस भूस्खलन ने पानी के बहाव को रोककर एक अस्थायी बांध जैसा बना दिया। बाद में यह बांध टूट गया और पानी का एक और प्रवाह नीचे की ओर आया। विशेषज्ञों ने इस घटना की तुलना उत्तराखंड के चमोली में हुई आपदा से भी की है। हालांकि, नेपाल में नुकसान का स्तर काफी ज्यादा होने की आशंका जताई जा रही है।

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    हजारों लोगों के मारे जाने या लापता होने की आशंका

    विशाल नाथ उप्रेती ने मृतकों और लापता लोगों की संख्या को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनके अनुसार, अब तक 5,000 से ज्यादा लोगों के मारे जाने या लापता होने की जानकारी सामने आई है। उन्होंने आशंका जताई कि अंतिम आंकड़ा 7,000 या 10,000 तक भी पहुंच सकता है। वहीं, नेपाल में आई इस अचानक आपदा ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया है। राहत और बचाव एजेंसियां प्रभावित इलाकों में स्थिति का आकलन कर रही हैं।

    वैज्ञानिक अब इस घटना को बड़े रॉकस्लाइड की संभावना से भी जोड़कर देख रहे हैं। इस थ्योरी के मुताबिक, बड़ी मात्रा में चट्टानें नीचे खिसकीं और उनके साथ बर्फ भी नीचे आई। विशेषज्ञों का कहना है कि संभव है कि ग्लेशियर खुद नीचे न खिसका हो, बल्कि बर्फ चट्टानों के ऊपर मौजूद रही हो। फिलहाल वैज्ञानिक इस संभावना की पुष्टि नहीं कर पाए हैं। प्रभावित क्षेत्र तक पहुंच मुश्किल होने के कारण वे मुख्य रूप से सैटेलाइट तस्वीरों और उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन कर रहे हैं।

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    By tina