पिछले साल भारत ने चाबहार बंदरगाह के लिए 400 करोड़ रुपए आवंटित किए थे। भारत ने 2017-18 से इस पोर्ट में निवेश शुरू किया था। लेकिन इस बार भारत ने ईरान के साथ साझा इस परियोजना के लिए कोई बजट नहीं रखा।
विश्लेषक मानते हैं कि भारत का चाबहार से कदम पीछे खींचना मुख्य रूप से अमेरिका के बढ़ते दबाव और बदलते भू-राजनीतिक हालात की वजह से है।
पिछले दो साल में ईरान की वैश्विक स्थिति कमजोर हुई है। विशेषज्ञ इसे भारत के निवेश रोकने का मुख्य कारण मान रहे हैं।
अमेरिकी प्रतिबंध, क्षेत्रीय अस्थिरता और बदलती भू-राजनीति पहले ही चाबहार की गति धीमी कर चुके हैं। अब भारत ने फंड नहीं आवंटित किया, जिससे पोर्ट ठप पड़ने का खतरा बढ़ गया है।
चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक महत्व क्यों रखता है?
यह बंदरगाह अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के लिए अहम माना जाता है। इस मार्ग से भारत की यूरोप तक पहुँच आसान होती है। इससे ईरान और रूस को भी लाभ मिलता है।
मई 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान का दौरा किया था। यह 15 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली ईरान यात्रा थी। इस दौरान भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय सहयोग के तहत इसके विकास और संचालन के लिए 55 करोड़ डॉलर निवेश का ऐलान किया गया था।
भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों तक सीधी पहुँच देता है।
अमेरिका भारत पर चाबहार को लेकर किस तरह दबाव डाल रहा है?
पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के संचालन में शामिल पक्षों पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था।हालांकि, अमेरिका ने भारत को इन प्रतिबंधों से छह महीने की छूट दी थी, जो फिलहाल लागू है, लेकिन आने वाले महीनों में समाप्त हो जाएग|
विश्लेषक मानते हैं कि केंद्रीय बजट में भारत ने चाबहार के लिए फंड न देने का सबसे बड़ा कारण अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर चिंता है।
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