ओडिशा राज्यसभा चुनाव 2026 में बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला। BJD और कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या होने के बावजूद उनकी तय मानी जा रही सीट हाथ से निकल गई। चार सीटों के इस चुनाव में BJP ने दो सीटें जीत लीं, जबकि BJD को एक सीट मिली। चौथी सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया। संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार डॉ. दत्तेश्वर होता को हार का सामना करना पड़ा। चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग ने पूरा समीकरण बदल दिया। इस नतीजे ने राज्य की राजनीति में अंदरूनी असंतोष को भी उजागर कर दिया।
BJP की रणनीति और चुनावी गणित
ओडिशा विधानसभा में BJP के पास 79 विधायक और तीन निर्दलीयों का समर्थन था, जिससे उसकी कुल ताकत 82 हो गई थी। इस संख्या के आधार पर वह आसानी से दो सीटें जीत सकती थी। दो सीटें जीतने के बाद भी उसके पास अतिरिक्त वोट बचे थे। इन वोटों का इस्तेमाल करते हुए BJP ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया। उसने स्वतंत्र उम्मीदवार Dilip Ray को समर्थन देकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया।
दूसरी ओर BJD के पास 48 प्रभावी विधायक थे, जबकि कांग्रेस और CPI(M) के समर्थन से यह संख्या 63 तक पहुंच रही थी। यह आंकड़ा एक अतिरिक्त सीट जीतने के लिए पर्याप्त माना जा रहा था। इसी आधार पर विपक्ष ने डॉ. दत्तेश्वर होता को संयुक्त उम्मीदवार बनाया। शुरुआत में यह सीट BJD-कांग्रेस गठबंधन के खाते में जाती हुई दिख रही थी। लेकिन BJP की रणनीतिक चाल ने पूरे चुनाव को नई दिशा दे दी।
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क्रॉस वोटिंग ने पलटा पूरा खेल
चुनाव में सबसे बड़ा फैक्टर क्रॉस वोटिंग रहा, जिसने पूरे परिणाम को बदल दिया। BJD और कांग्रेस के कई विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर मतदान किया। इससे संयुक्त उम्मीदवार के वोट कम हो गए और उनकी स्थिति कमजोर हो गई। यह बदलाव इतना बड़ा था कि जीत की स्थिति हार में बदल गई।
मिली जानकारी के अनुसार BJD के चार और कांग्रेस के तीन विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। इन विधायकों में पहले से असंतोष की खबरें सामने आ रही थीं। पार्टी नेतृत्व को मतदान से पहले इस खतरे का अंदाजा भी था। कुछ विधायकों को नोटिस भी जारी किए गए थे। इसके बावजूद अंतिम समय में स्थिति को संभाला नहीं जा सका और विपक्ष को नुकसान उठाना पड़ा।
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अंदरूनी असंतोष और राजनीतिक असर
इस हार ने BJD के अंदर चल रहे असंतोष को उजागर कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री Naveen Patnaik की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के भीतर समन्वय की कमी साफ दिखाई दी। विधायकों और नेतृत्व के बीच दूरी इस परिणाम में झलकती है। यह स्थिति आने वाले समय में पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है।
कांग्रेस के भीतर भी नाराजगी सामने आई है। कुछ विधायकों ने उम्मीदवार चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका मानना था कि फैसले में उनकी राय को महत्व नहीं दिया गया। गठबंधन के बावजूद दोनों दलों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आई। इस हार ने यह संकेत दिया कि केवल गठबंधन बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे मजबूत बनाए रखना भी जरूरी है।


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