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    पूर्वोत्तर में जापान

    पूर्वोत्तर भारत में जापान की मौजूदगी बढ़ाने की वकालत करते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भारत-जापान सहयोग को मजबूत करने की जरूरत बताई। India Today Indo-Japan Conclave में उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र भारत की Act East नीति का अहम हिस्सा है। उनके मुताबिक, देश ने लंबे समय तक इस क्षेत्र की रणनीतिक क्षमता का पूरा उपयोग नहीं किया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में जापानी निवेश की कमी का जिक्र करते हुए चीन से जुड़े भू-राजनीतिक कारणों को इसकी बड़ी वजह बताया। रिजिजू का मानना है कि जापान की सक्रिय भागीदारी से क्षेत्र के विकास को नई गति मिल सकती है। रिजिजू ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ने का महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है।

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    युवाओं और संस्कृति पर फोकस

    उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र को केवल सीमावर्ती इलाका नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी माना कि भारत पूर्वोत्तर की भौगोलिक स्थिति का पूरा लाभ नहीं उठा सका। हालांकि, Act East नीति के जरिए सरकार अब कनेक्टिविटी और निवेश बढ़ाने पर ध्यान दे रही है। उनका मानना है कि इससे क्षेत्र की आर्थिक संभावनाएं मजबूत होंगी। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में जापानी आर्थिक गतिविधियां अभी सीमित हैं। उन्होंने बताया कि चीन से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के कारण कई निवेश योजनाएं आगे नहीं बढ़ पातीं। इसलिए, जापान की भागीदारी बढ़ाने के लिए नई पहल की जरूरत है। रिजिजू ने सुझाव दिया कि जापान को पूर्वोत्तर में बड़े और दिखाई देने वाले बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट शुरू करने चाहिए। उनका कहना है कि ऐसे प्रोजेक्ट निवेशकों का भरोसा बढ़ाएंगे और स्थानीय लोगों को भी विकास का सीधा लाभ मिलेगा।

    रिजिजू ने कहा कि भारत और जापान को कौशल विकास के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना चाहिए। इससे पूर्वोत्तर के युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकते हैं। उन्होंने दोनों देशों के बीच विशेष समझौतों की भी जरूरत बताई। इसके अलावा, उन्होंने बौद्ध धर्म को भारत की बड़ी सॉफ्ट पावर बताया। उनके अनुसार, जापान समेत कई एशियाई देशों में भारत को बुद्ध की भूमि के रूप में सम्मान मिलता है। उनका मानना है कि सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाकर दोनों देशों के रिश्तों को और गहरा किया जा सकता है।

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