फरवरी में होने वाले आम चुनावों से पहले बांग्लादेश में भारत-विरोधी बयानबाज़ी तेज़ हो रही है। विभिन्न राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए भारत को निशाने पर ले रहे हैं और माहौल गर्म कर रहे हैं। नेशनल सिटीजन पार्टी के नेता हसनत अब्दुल्ला ने पूर्वोत्तर भारत के अलगाववादी तत्वों को शरण देने की बात कही। दो महीने बाद होने वाले चुनावों से पहले बांग्लादेश की राजनीति भारत के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई है। यह स्थिति दो साल पहले मालदीव में हुए आम चुनावों की याद दिलाती है और समानता दिखाती है। उस समय प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव्स के नेता मोहम्मद मोइज्जू सत्ता में आने से पहले भारत-विरोध को प्रमुख हथियार बनाया।
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मालदीव के मोइज्जू मॉडल का बांग्लादेश में असर? भारत-विरोधी रुख उठा अहम मुद्दा
मोइज्जू ने चीन को मालदीव का मुख्य रणनीतिक साझेदार बताया और भारत से रिश्ते कमजोर करने की सलाह दी। मालदीव की अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रही, इसके बावजूद भारत-विरोधी रुख अपनाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार भारत-विरोधी राजनीति से चुनावी लाभ मिल सकता है, लेकिन गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं। प्रधानमंत्री यूनुस के लिए यह रणनीति संभावित लाभ से ज्यादा जोखिम भरी साबित हो सकती है। यूनुस अर्थशास्त्री और सिविल सोसायटी के प्रमुख रहे हैं, और उनका राजनीतिक अनुभव सीमित रहा है। इस कारण भारत-विरोधी रुख चरमपंथी संगठनों को बढ़ावा देने का खतरा पैदा करता है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि बांग्लादेश में आतंकी प्रशिक्षण शिविर सक्रिय हो गए हैं और अल-कायदा की मौजूदगी चिंता बढ़ा रही है। विश्लेषकों का कहना है कि ढाका की राजनीति में अचानक भारत-विरोधी रुख सत्ता परिवर्तन के बाद उभरा है।
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