बांग्लादेश की पूर्व और पहली महिला प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया का मंगलवार सुबह छह बजे 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं और राजधानी ढाका में इलाज चल रहा था। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास का एक अहम अध्याय समाप्त हो गया। ख़ालिदा ज़िया का जन्म 1945 में अविभाजित भारत के पश्चिम बंगाल में हुआ था। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार पूर्वी पाकिस्तान, यानी वर्तमान बांग्लादेश, चला गया। 15 साल की उम्र में उन्होंने सेना के युवा अधिकारी ज़ियाउर रहमान से विवाह किया। 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में ज़ियाउर रहमान ने पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ विद्रोह का नेतृत्व किया और बांग्लादेश की आज़ादी की घोषणा की।
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घरेलू जीवन से राष्ट्रीय राजनीति तक का सफ़र
1977 में ज़ियाउर रहमान राष्ट्रपति बने। उस दौर में लोग ख़ालिदा ज़िया को एक शर्मीली और घरेलू महिला के रूप में जानते थे, जिनकी रुचि सार्वजनिक जीवन में नहीं थी। लेकिन 1981 में चटगांव में सेना के विद्रोही अधिकारियों ने ज़ियाउर रहमान की हत्या कर दी। इस घटना ने ख़ालिदा ज़िया का जीवन पूरी तरह बदल दिया। पति की मौत के बाद उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सदस्यता ली और जल्द ही पार्टी का नेतृत्व संभाल लिया। 1980 के दशक में सैन्य शासन के ख़िलाफ़ उन्होंने लोकतंत्र बहाली के लिए आंदोलन चलाया। सरकार ने उन्हें कई बार गिरफ़्तार किया और नज़रबंद भी रखा, लेकिन उन्होंने राजनीतिक संघर्ष जारी रखा।
1991 के आम चुनावों में ख़ालिदा ज़िया ने जीत हासिल की और बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। वह किसी मुस्लिम देश का नेतृत्व करने वाली दुनिया की शुरुआती महिला नेताओं में भी शामिल रहीं। सत्ता में आने के बाद उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाया तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूत करने की कोशिश की। 1996 में उन्हें चुनावी हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 2001 में उन्होंने इस्लामी दलों के साथ गठबंधन कर दोबारा सत्ता हासिल की। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने संसद में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने और महिला शिक्षा को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए।
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सत्ता, टकराव और विवादों से भरा दौर
हालांकि उनका पूरा राजनीतिक जीवन कट्टर प्रतिद्वंद्वी शेख़ हसीना के साथ टकराव से घिरा रहा। सत्ता से बाहर होने के बाद सरकार ने उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज किए और अदालत ने उन्हें जेल भेजा। ख़ालिदा ज़िया ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया। जेल में रहते हुए उनकी सेहत लगातार बिगड़ती चली गई। 2018 के बाद स्वास्थ्य कारणों से सरकार ने उन्हें जेल से रिहा कर घर में रहने की अनुमति दी। 2024 में देश में हुए जनविद्रोह के बाद शेख़ हसीना सत्ता से बाहर हुईं और अंतरिम सरकार ने ख़ालिदा ज़िया पर लगे सभी आरोप हटा दिए।
जीवन के अंतिम वर्षों में ख़ालिदा ज़िया गठिया, डायबिटीज़ और लीवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित रहीं। एक संकोची गृहिणी से दो बार प्रधानमंत्री बनने तक, उनका राजनीतिक सफ़र बांग्लादेश की राजनीति में साहस, संघर्ष और विवादों का प्रतीक बन गया।
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