दावोस 2026 में ब्रिक्स प्लस के मतभेद खुलकर सामने आए. दरअसल, पहले समूह ने विस्तार को बड़ी उपलब्धि बताया था. हालांकि, अब सदस्य देशों के हित आपस में टकरा रहे हैं. इसी कारण, BRICS+ रणनीतिक दबाव महसूस कर रहा है. इसके साथ ही, अंदरूनी असहमति और अधिक स्पष्ट दिखने लगी है. वहीं दूसरी ओर, कई देशों ने सार्वजनिक मंच पर अलग राय रखी. फलस्वरूप, समूह की एकजुटता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं. अंततः, यह स्थिति संगठन की विश्वसनीयता को भी प्रभावित कर रही है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि समूह सुधारवादी ढांचे में काम करता है. हालांकि, उसमें अभी भी मजबूत नेतृत्व की कमी दिखाई देती है. इसी वजह से, चीन, रूस और भारत के रुख अलग-अलग नजर आते हैं. उदाहरणस्वरूप, चीन डॉलर के विकल्प को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाना चाहता है. लेकिन इसके विपरीत, कई देश इस विचार से पूरी तरह सहमत नहीं हैं. मसलन, सऊदी अरब अभी भी डॉलर प्रणाली से गहराई से जुड़ा है. साथ ही, यूएई भी ब्रिक्स करेंसी को लेकर सतर्क रुख अपना रहा है. इस प्रकार, साझा नीति बनाना लगातार कठिन होता जा रहा है.
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ब्रिक्स: बढ़ती चुनौतियां
इसके अतिरिक्त, सदस्य देशों की आर्थिक प्राथमिकताएं अलग दिशा तय कर रही हैं. वहीं, राजनीतिक दृष्टिकोण भी एक-दूसरे से लगातार टकरा रहे हैं. परिणामस्वरूप, नेता निर्णय लेने में देरी कर रहे हैं. इतना ही नहीं, वे आम सहमति बनाने में भी निरंतर संघर्ष कर रहे हैं. दरअसल, समूह अभी तक स्पष्ट दिशा तय नहीं कर पा रहा है. इसी बीच, सदस्य आपसी विश्वास को पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं कर पा रहे हैं. फलस्वरूप, वे रणनीतिक लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं कर रहे हैं. इसी कारण, नीतिगत स्पष्टता कमजोर पड़ रही है. अंततः, समन्वय की कमी संगठन की समग्र गति धीमी कर रही है.
बाहरी दबाव और बदलते समीकरण
इसके अलावा, रूस सैन्य शक्ति पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है. हालांकि, दूसरी तरफ वह आर्थिक रूप से चीन पर निर्भर रह रहा है. इससे स्वाभाविक रूप से समूह का आंतरिक संतुलन प्रभावित हो रहा है. इसी दौरान, अमेरिका भी अपना दबाव लगातार बढ़ा रहा है. उदाहरण के तौर पर, डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ लगाए. इसके परिणामस्वरूप, भारत ने संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनाई. वहीं दूसरी ओर, नए सदस्य जुड़कर जटिलताएं और बढ़ा रहे हैं. अंततः, विस्तार एकता मजबूत करने के बजाय मतभेद और स्पष्ट कर रहा है.
साथ ही, ईरान की सक्रिय मौजूदगी भू-राजनीतिक समीकरण बदल रही है. वहीं, मिस्र और इथियोपिया भी अपने-अपने हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं. इसके कारण, साझा आर्थिक एजेंडा अपेक्षाकृत कमजोर पड़ रहा है. हालांकि, कुछ देश अब भी सार्वजनिक रूप से एकजुटता प्रदर्शित कर रहे हैं. लेकिन, व्यवहारिक स्तर पर उनका तालमेल सीमित ही बना हुआ है. इसी कारण, बाहरी दबाव का प्रभाव और अधिक बढ़ रहा है. फलस्वरूप, रणनीतिक स्पष्टता की मांग लगातार तेज हो रही है. आखिरकार, BRICS+ अपने भविष्य की दिशा को लेकर अभी भी स्पष्ट निर्णय नहीं ले पा रहा है.
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