सिस्टमैटिक रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की बहुचर्चित ‘गोल्डीलॉक्स’ अर्थव्यवस्था में अब दबाव के संकेत दिखने लगे हैं। अब तक इसे संतुलित और मजबूत माना जा रहा था। हालांकि, कमजोर कर संग्रह और सिमटते राजकोषीय दायरे ने सरकार को नीतिगत जटिलता यानी पॉलिसी ग्रिडलॉक की ओर धकेल दिया है। रिपोर्ट का कहना है कि ऊपरी तौर पर मजबूत दिखती विकास दर असल कमजोरियों को छिपा रही है। इसके अलावा, रिपोर्ट बताती है कि हेडलाइन जीडीपी आंकड़े अर्थव्यवस्था की आंतरिक गति की नाजुक स्थिति को ढक देते हैं। नतीजतन, सरकार एक कठिन नीतिगत दुविधा में फंस गई है। एक ओर विकास को बनाए रखने का दबाव है, तो दूसरी ओर वित्तीय संतुलन साधने की मजबूरी। इसी कारण दिखावटी स्थिरता और वास्तविक आर्थिक दबाव के बीच अंतर साफ नजर आता है।
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भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन मजबूत जीडीपी ग्रोथ के बीच बढ़ते जोखिमों पर रिपोर्ट ने ध्यान दिलाया है
इसी बीच, राजस्व मोर्चे पर भी तनाव के संकेत मिलते हैं। सिगरेट पर बेसिक एक्साइज ड्यूटी में हालिया बढ़ोतरी इसका एक उदाहरण है। यह फैसला जीएसटी सुधारों के कुछ महीनों बाद लिया गया। इससे सालाना करीब 400 अरब रुपये अतिरिक्त राजस्व मिलने का अनुमान है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम नए राजस्व स्रोतों की सीमित उपलब्धता को दर्शाता है। वहीं, मौद्रिक नीति के स्तर पर भी स्थिति सामान्य नहीं दिखती। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2 ट्रिलियन रुपये के अतिरिक्त सरकारी बॉन्ड ओपन मार्केट ऑपरेशंस की घोषणा की।
साथ ही, 10 अरब डॉलर के डॉलर-रुपया खरीद-बिक्री ऑपरेशन का ऐलान किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 8 प्रतिशत वास्तविक जीडीपी वृद्धि और लगभग शून्य महंगाई वाले ‘गोल्डीलॉक्स फेज’ में ऐसे कदम असामान्य माने जाते हैं। इसके बावजूद, नीति निर्माताओं ने सीआरआर और रेपो रेट में बड़ी कटौती जैसे कदम उठाए। इसके साथ ही भारी तरलता भी बाजार में डाली गई। लेकिन बाजार संकेत बताते हैं कि इससे वित्तीय हालात में खास सुधार नहीं हुआ। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि आक्रामक राजकोषीय विस्तार और अधिक लिक्विडिटी निजी निवेश पर दबाव बढ़ा सकती है। कुल मिलाकर, मजबूत दिखती अर्थव्यवस्था के पीछे बढ़ती नीतिगत जटिलता भारत के लिए एक नई चुनौती बनती जा रही है।
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