यमुना नदी में झाग कम करने के लिए लंबे समय तक रसायन छिड़कने पर चिंता जताई गई। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर जिम्मेदार एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि झागनाशक रसायनों का लगातार उपयोग गंभीर पारिस्थितिक खतरा पैदा कर सकता है। सप्ताह की शुरुआत में उपराज्यपाल वीके सक्सेना, मुख्यमंत्री और DPCC को पत्र भेजा गया। पत्र में DPCC से दिल्ली जल बोर्ड के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का आग्रह किया गया। पर्यावरण समूह ने बताया कि 2022-2024 के दौरान रसायनों का उपयोग केवल छठ पूजा तक सीमित रहा।
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सिलिकॉन आधारित डिफोमर के दुष्प्रभाव
पर्यावरण समूह ने अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों का हवाला देते हुए सिलिकॉन-आधारित डिफोमर के खतरे बताए। प्रमुख तत्व पॉलीडाइमिथाइलसिलोक्सेन (PDMS) अधिक मात्रा में पानी की सतह पर हाइड्रोफोबिक परत बना सकता है। यह परत जल में ऑक्सीजन के आदान-प्रदान में बाधा डालती है, जिससे हाइपोक्सिया उत्पन्न होता है। हाइपोक्सिया का मतलब जलजीवों के लिए आवश्यक ऑक्सीजन स्तर में कमी और उनके जीवन पर असर है। ऐसी सतहें मछलियों और अन्य तटीय जलीय जीवों के लिए भी विषैली साबित हो सकती हैं। पत्र में चेतावनी दी गई कि यह रासायनिक छिड़काव यमुना में प्रदूषण और बढ़ा सकता है।
इसलिए, पर्यावरण समूह ने DPCC से आग्रह किया कि DJB के खिलाफ कार्रवाई शुरू की जाए। समूह ने ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ के तहत पर्यावरणीय मुआवजा लागू करने की भी मांग की। समूह का कहना है कि मुआवजा यमुना संरक्षण, सुधार और पुनर्स्थापन कार्यों में उपयोग होना चाहिए। इसमें छिड़काव से पहले और बाद की जल गुणवत्ता की निगरानी शामिल होनी चाहिए। इसके साथ वैज्ञानिक विश्लेषण और जलीय जीवन पर केमिकल छिड़काव के प्रभाव का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। पत्र में केमिकल छिड़काव का स्वतंत्र मूल्यांकन करने की मांग भी की गई।
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