‘मदर ऑफ़ ऑल डील्स’, ‘सबसे बड़ा समझौता’, ‘वास्तव में ऐतिहासिक’—ये कई विशेषण भारत–यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हुई 16वीं बैठक के नतीजों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
अधिकतर टिप्पणियाँ भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते (एफ़टीए) की बातचीत पूरी होने पर केंद्रित हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे साझी समृद्धि का नया ब्लूप्रिंट बताया।
लेकिन सवाल यह है कि यह एफटीए वास्तव में क्या हासिल करना चाहता है। इसमें कौन-कौन से पहलू शामिल हैं और कौन से शामिल नहीं हैं। विभिन्न क्षेत्रों और हितधारकों पर इसका क्या असर पड़ रहा है। वहीं, भारत के बाहर इसके बारे में कैसी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।
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एफ़टीए में शामिल और शामिल नहीं होने वाले पहलुओं का खुलासा
भारत सरकार ने कहा है कि समझौते के बाद भारत का 99% से अधिक निर्यात यूरोपीय संघ (ईयू) में विशेष रियायतों के साथ किया जा सकेगा। इसके अलावा, समझौते में वस्तु और सेवा व्यापार, व्यापार समाधान, सीमा शुल्क, व्यापार सुविधा के साथ-साथ एसएमई और डिजिटल व्यापार जैसे उभरते क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है।
इसलिए, भारत को उम्मीद है कि टेक्सटाइल, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्नजवाहरात, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान और ऑटोमोबाइल के निर्यात में तेज़ी आएगी।
वहीं, ईयू को उम्मीद है कि समझौते के तहत उसके 96.6% निर्यात पर लगे शुल्क हटने या कम होने से 2032 तक उसका निर्यात दोगुना हो जाएगा। इसके साथ ही, ईयू ने कहा कि भारत ने उसे ऐसे टैरिफ़ लाभ दिए हैं जो किसी अन्य देश को नहीं मिले।उदाहरण के लिए, कारों पर शुल्क 110% से घटकर धीरे-धीरे 10% रह जाएगा। साथ ही, कार पार्ट्स पर शुल्क पाँच से 10 साल में पूरी तरह समाप्त हो जाएगा
ईयू ने कहा कि एफटीए के दस्तावेज़ का अनुवाद उसकी सभी आधिकारिक भाषाओं में किया जाएगा। इसके बाद, इसे दो चरणों में समीक्षा के लिए रखा जाएगा। अंत में, भारत को अंतिम दस्तावेज़ को मंज़ूरी देनी होगी। तभी यह समझौता लागू होगा।
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