सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अजमेर शरीफ दरगाह में वार्षिक उर्स के दौरान प्रधानमंत्री ,अन्य संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा चादर चढ़ाने की परंपरा को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस परंपरा पर पूरी तरह रोक लगाने का कोई ठोस कानूनी आधार पेश नहीं कर पाए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अजमेर की स्थानीय अदालत में दरगाह स्थल से जुड़ा जो मामला लंबित है, उस पर सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अदालत ने कहा कि संबंधित निचली अदालत उस मुकदमे का निपटारा अपने स्तर पर करेगी। विश्व वैदिक सनातन संघ के प्रमुख जितेंद्र सिंह बिसेन और हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने यह जनहित याचिका दायर की थी।
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लंबित विवाद के बावजूद परंपरागत धार्मिक गतिविधियों पर रोक का आधार नहीं
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि अजमेर शरीफ दरगाह में चादर चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1947 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी, जिसे बाद में हर वर्ष निभाया जाता रहा। उन्होंने दावा किया कि इस परंपरा का न तो किसी कानून में उल्लेख है और न ही इसे संविधान का समर्थन प्राप्त है। याचिका में यह भी कहा गया था कि अजमेर शरीफ दरगाह को एक प्राचीन शिव मंदिर के स्थान पर बने होने का दावा करने वाला मामला पहले से ही अजमेर की एक अदालत में विचाराधीन है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि ऐसे में विवादित स्थल पर संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा चादर चढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि लंबित विवाद के बावजूद परंपरागत धार्मिक गतिविधियों को पूरी तरह रोकने का आधार इस याचिका में मौजूद नहीं है। इस फैसले के साथ ही अजमेर शरीफ में चादरपोशी की परंपरा को लेकर कानूनी चुनौती फिलहाल समाप्त हो गई है।


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