• Sat. Mar 7th, 2026

    बीते फैसलों पर चुप्पी, मौजूदा नीति पर विरोध — इज़रायल को लेकर लेफ्ट की बदलती सोच पर बहस

    इज़रायल

    भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां आज भी इज़रायल का विरोध करती हैं। ऐसे में मौजूदा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव एम ए बेबी के सामने यह सवाल उठता है कि वे अपने पूर्व नेता ज्योति बसु के उस फैसले को कैसे देखेंगे, जब उन्होंने इज़रायल का दौरा किया था और उसकी खुले तौर पर सराहना की थी। दिलचस्प रूप से, उनके करीबी मित्र यासिर अराफात फिलिस्तीन के प्रमुख नेता थे।

    करीब 25 साल पहले, जब ज्योति बसु पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने बदलते वैश्विक हालात को समझते हुए इज़रायल के साथ संबंधों को व्यावहारिक नजरिए से देखा। उस समय उनकी पार्टी पारंपरिक रूप से इज़रायल विरोधी रुख रखती थी, फिर भी बसु ने तकनीक और विकास के संभावित लाभों को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में पहल की।

    जून 2000 में वे एक बड़े व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ इज़रायल पहुंचे थे। हालांकि, यह कदम अचानक नहीं था। इससे पहले 1998 में उन्होंने सोमनाथ चटर्जी को संभावनाओं का आकलन करने के लिए वहां भेजा था।

    Also Read:सरकार IRFC में 4% तक हिस्सेदारी बेचेगी 25 फरवरी से OFS खुला शेयर 4% गिरा

    लेफ्ट का दोहरा मापदंड: ज्योति बसु की यात्रा भूल, मोदी दौरे पर सवाल

    बसु के इस निर्णय से पार्टी के भीतर आलोचना भी हुई, लेकिन अंततः इसे व्यावहारिक आर्थिक कदम के रूप में देखा गया। पार्टी का मानना था कि पश्चिम बंगाल की कंपनियां आईटी, इलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि जैसे क्षेत्रों में इज़रायल के साथ सहयोग कर सकती हैं, क्योंकि वह उन्नत तकनीक और नवाचार में अग्रणी था।

    इसके बावजूद, समय के साथ कम्युनिस्ट पार्टी का इज़रायल विरोध समाप्त नहीं हुआ है। हाल ही में एम ए बेबी ने नरेंद्र मोदी के इज़रायल दौरे की आलोचना करते हुए कहा कि फिलिस्तीन के मुद्दे पर जारी हमलों के बीच इस देश के साथ निकटता भारत की ऐतिहासिक एंटी-कोलोनियल सोच और फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थन से अलग है।

    Also Read:तेल का विशाल कार्गो वेनेजुएला से भारत के लिए रवाना

    Share With Your Friends If you Loved it!
    One thought on “बीते फैसलों पर चुप्पी, मौजूदा नीति पर विरोध — इज़रायल को लेकर लेफ्ट की बदलती सोच पर बहस”

    Comments are closed.