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    जाति जनगणना 2027 पर सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश, याचिका खारिज

    जनगणना

    सुप्रीम कोर्ट ने आगामी जाति जनगणना की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि जनगणना कराना और उसकी प्रक्रिया तय करना विशेषज्ञ निकाय का काम है। कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की चिंताओं को गंभीरता से लिया। अदालत ने उन्हें सरकार के समक्ष अपने सुझाव रखने की अनुमति दी। साल 2027 में प्रस्तावित जाति जनगणना की योजना को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई नहीं हुई।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची की बेंच ने इस पर दखल देने से इनकार कर दिया। बेंच ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे सरकार के उपयुक्त मंच पर अपनी आपत्तियां रखें। याचिका में मांग की गई थी कि जाति जनगणना केवल ‘स्व-घोषणा’ के आधार पर न हो। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह प्रक्रिया ‘सत्यापन योग्य सामग्री’ पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि इस जनगणना पर 13,500 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आएगा। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस प्रक्रिया से जुटाया गया डेटा अगले 40 वर्षों तक नीतियों को प्रभावित करेगा। इसलिए डेटा का सटीक होना बेहद जरूरी है।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि जनगणना जैसी कवायद विशेषज्ञों द्वारा तैयार की जाती है। उन्होंने कहा कि ऐसे तकनीकी और व्यापक कार्य अनुभवी लोगों को ही करने चाहिए। बेंच ने जनगणना अधिनियम 1958 और वर्ष 1990 के नियमों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि इन कानूनों के तहत अधिकारियों को प्रक्रिया तय करने का अधिकार है। अदालत ने भरोसा जताया कि विशेषज्ञों की मदद से मजबूत तंत्र तैयार किया गया होगा। कोर्ट ने कहा कि इससे त्रुटियों की संभावना कम रहेगी।

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    विशेषज्ञों पर छोड़ें जनगणना का काम

    याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि मौजूदा मानदंड केवल ‘स्व-घोषणा’ पर आधारित हैं। उनके अनुसार, यह सटीक डेटा के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने बताया कि इस बार एससी और एसटी के अलावा ओबीसी वर्ग को भी जनगणना में शामिल किया जा रहा है। इसके बावजूद जातिगत पहचान दर्ज करने के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश सार्वजनिक नहीं हैं।

    याचिका में यह भी कहा गया कि दिल्ली में लिस्टिंग नहीं की जा रही है। इससे डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। कोर्ट के सामने यह तर्क भी रखा गया कि यह डेटा अगले 40 वर्षों तक सामाजिक कल्याण नीतियों को प्रभावित करेगा। इसलिए इसकी शुद्धता बेहद अहम है।

    याचिकाकर्ता, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, ने 9 जुलाई 2025 को रजिस्ट्रार जनरल को कानूनी नोटिस भेजा था। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि यह विशेषज्ञ निकाय का विषय है। उन्होंने याचिकाकर्ता को सरकार के समक्ष पूरक प्रस्तुति देने की छूट दी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।

    अदालत ने अधिकारियों से कहा कि वे उठाए गए मुद्दों और सुझावों पर विचार करें। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका की प्रति भेजने की अनुमति भी दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञ संस्थाओं को अपनी प्रक्रिया तय करने दी जानी चाहिए। साथ ही प्रशासन को नागरिकों की जायज चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए।

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