पहले, लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बिना चर्चा के पारित हुआ। इसके बाद, प्रधानमंत्री का पारंपरिक जवाब भी सदन में नहीं दिया गया। इस दौरान, सत्तापक्ष ने विपक्ष को बार-बार बाधा डालने का जिम्मेदार ठहराया। नतीजतन, गुरुवार को हंगामे के बीच प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित किया गया।
इसी बीच, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पुरानी घटनाओं का हवाला देकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, वर्ष 2004 में मनमोहन सिंह को भी धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने से रोका गया। बाद में, 2005 में मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति को दो बार धन्यवाद दिया था। इसलिए, उन्होंने बीजेपी पर संसदीय परंपराएं तोड़ने का आरोप लगाया।
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राष्ट्रपति के अभिभाषण पर टकराव बढ़ा
उधर, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा, उन्हें विश्वसनीय सूचना मिली थी कि अप्रत्याशित घटनाएं हो सकती थीं। इसी कारण, उन्होंने प्रधानमंत्री को अगले दिन सदन में न आने की सलाह दी।इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस और विवाद खड़ा कर दिया।
अंततः, विपक्ष ने अध्यक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। प्रियंका गांधी ने कहा, सरकार चर्चा से बचने के लिए बहाने बना रही है। वहीं, राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर सच से डरने का आरोप लगाया। इस तरह, सत्ता और विपक्ष के बीच कटुता और गहराती दिखाई दी।
इस बीच, राजनीतिक विश्लेषकों ने इस घटनाक्रम को संसदीय इतिहास के लिए असामान्य बताया। उनका कहना है, सरकार और विपक्ष संवाद के बजाय टकराव का रास्ता अपना रहे हैं। इसके अलावा, प्रधानमंत्री का लोकसभा में न बोलना लोकतांत्रिक परंपराओं पर सवाल खड़े करता है। अंततः, यह प्रकरण संसद की कार्यप्रणाली और आपसी विश्वास पर गहरी चिंता दिखाता है।
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