कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने कहा कि फलस्तीन मुद्दे पर मोदी सरकार की चुप्पी मानवता और नैतिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने बताया कि भारत जैसे राष्ट्र को वैश्विक नेतृत्व दिखाना चाहिए, लेकिन वर्तमान सरकार निजी संबंधों के आधार पर अपनी विदेश नीति चला रही है। इसके साथ ही उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने 1988 में फलस्तीन को मान्यता दी थी और हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा रहा है।
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इज़राइल की प्रतिक्रिया में फलस्तीन नागरिकों पर भारी तबाही और अमानवीय परिस्थितियां
सोनिया गांधी ने कहा कि अक्टूबर 2023 में जब हमास ने इज़राइल पर हमला किया, उसके बाद इज़राइल की प्रतिक्रिया नरसंहार जैसी रही। उन्होंने बताया कि इस संघर्ष में अब तक 55,000 से अधिक फलिस्तीनी नागरिक मारे जा चुके हैं, जिनमें 17,000 से अधिक बच्चे शामिल हैं। गाजा की स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि व्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है। उन्होंने बताया कि लोग भूख और रोग के बीच फंसे हुए हैं, मदद की सप्लाई रोकी गई है, और खाने के लिए लाइन में खड़े लोगों को गोली मारी गई। यह अत्यंत अमानवीय और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, जिससे मानवता शर्मसार हो रही है।
सोनिया गांधी फलस्तीनी संघर्ष में न्याय और मानवाधिकारों के लिए भारत को नैतिक नेतृत्व दिखाना चाहिए
सोनिया गांधी ने फलस्तीनी संघर्ष की तुलना भारत की आजादी से करते हुए कहा कि फलस्तीन के लोग दशकों से बेघर, शोषित और अपने अधिकारों से वंचित रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमें इतिहास से मिली संवेदना को साहस, सक्रियता और मजबूत नीति में बदलने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि इस मुद्दे पर चुप्पी अब तटस्थता नहीं मानी जा सकती। यह समय है न्याय, स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय और मानवाधिकारों के लिए दृढ़ता से खड़े होने का। सोनिया गांधी ने कहा कि भारत को केवल राजनयिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अपनी नैतिक, सभ्यतागत और वैश्विक जिम्मेदारियों के अनुसार इस मुद्दे को गंभीरता से देखना चाहिए।

