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    ‘समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों पर विवाद: क्या प्रस्तावना को फिर से लिखा जाएगा?

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले (RSS Leader Dattatreya Hosabale) ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में दो शब्दों – समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष का भाग्य बहस के जरिए तय किया जाना चाहिए. आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर आयोजित एक कार्यक्रम में होसबोले ने कहा कि इमरजेंसी के दौरान संविधान में दो शब्द धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी जोड़े गए थे, जो मूल प्रस्तावना का हिस्सा नहीं थे. इन शब्दों को बाद में हटाया नहीं गया. उन्हें रहना चाहिए या नहीं, इस पर बहस होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि ये दो शब्द डॉ. अंबेडकर के संविधान में नहीं थे. इमरजेंसी के दौरान देश में न तो संसद थी, ना ही अधिकार और ना ही न्यायपालिका, फिर भी ये दो शब्द जोड़े गए. 

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    आपातकाल और समाजवादी-धर्मनिरपेक्षता पर बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने

    बता दें कि 1975 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ को बीजेपी ने “संविधान हत्या दिवस” ​​के रूप में मनाकर कांग्रेस के साथ एक नया मोर्चा खोल दिया है. दोनों दलों के बीच टकराव फिर शुरू हो गया है. जेपी नड्डा से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तक, सभी नेता कांग्रेस पर निशाना साध रहे हैं. बीजेपी के इस कदम का कांग्रेस भी तीखा जवाब दे रही है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि जिन लोगों ने कभी स्वतंत्रता संग्राम या संविधान निर्माण में योगदान नहीं दिया, वे अब इसका बचाव करने का दावा कर रहे हैं.

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    दत्तात्रेय होसबोले ने कांग्रेस और राहुल गांधी का नाम लिए बिना उन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जिन लोगों ने आपातकाल लगाया था, वे आज संविधान की प्रतियां लेकर घूम रहे हैं. जबकि उन्होंने आज तक देश के लोगों से इसके लिए माफी नहीं मांगी है. आरएसएस नेता ने कहा कि आपने 1 लाख से ज्यादा लोगों को जेल में डाला, 250 से ज्यादा पत्रकारों को जेल में रखा, मौलिक अधिकारों का हनन किया और 60 लाख भारतीयों को नसबंदी के लिए मजबूर किया. आपने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खत्म कर दिया. क्या ऐसा करने वाले लोगों ने देश से माफी मांगी है. अगर ये आपके पूर्वजों ने किया तो आपको उनके नाम पर माफी मांगनी चाहिए.

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