मध्य पूर्व में जीपीएस जैमिंग समुद्री सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है। हाल के दिनों में होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उसके आसपास कई जहाज़ों की लोकेशन अचानक गलत दिखाई देने लगी है। समुद्री डेटा का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों ने पाया कि सैकड़ों जहाज़ डिजिटल नक्शे पर अजीब गोल समूहों में दिखाई दे रहे थे। कुछ जहाज़ तो जमीन के ऊपर मौजूद दिख रहे थे, जबकि वे वास्तव में समुद्र में चल रहे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या GPS सिग्नल में जानबूझकर की गई गड़बड़ी यानी जीपीएस जैमिंग के कारण हो रही है।
मध्य पूर्व में जीपीएस जैमिंग क्या है
जीपीएस जैमिंग एक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीक है। इसमें तेज़ रेडियो सिग्नल भेजकर असली GPS सिग्नल को बाधित कर दिया जाता है। जब ऐसा होता है तो जहाज़, ड्रोन, मोबाइल फोन या विमान अपनी सही लोकेशन नहीं पहचान पाते। कई बार उपकरण गलत लोकेशन दिखाने लगते हैं या सिग्नल पूरी तरह गायब हो जाता है। युद्ध या तनाव वाले इलाकों में इस तकनीक का इस्तेमाल दुश्मन को भ्रमित करने के लिए किया जाता है।
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जहाज़ों की नेविगेशन प्रणाली पर असर
समुद्र में जहाज़ एक-दूसरे की लोकेशन जानने के लिए ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) का इस्तेमाल करते हैं। यह सिस्टम GPS डेटा के आधार पर काम करता है। जब जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी होती है तो जहाज़ों की लोकेशन गलत दिखाई देने लगती है। विशेषज्ञों के मुताबिक बड़े तेल टैंकरों को दिशा बदलने या रुकने में काफी समय लगता है। कई टैंकर 300 मीटर तक लंबे होते हैं और उन्हें पूरी तरह रुकने में कई किलोमीटर लग सकते हैं। अगर कप्तान को आसपास के जहाज़ों की सही जानकारी न मिले तो समुद्र में टक्कर का खतरा बढ़ सकता है।
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किसके पीछे होने का शक
अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस जीपीएस जैमिंग के पीछे कौन है। हालांकि कई सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। कुछ विशेषज्ञों को शक है कि इसमें ईरान की भूमिका हो सकती है। वहीं यह भी संभावना जताई जा रही है कि क्षेत्र में मौजूद सैन्य बल अपने ठिकानों और जहाज़ों को ड्रोन या मिसाइल हमलों से बचाने के लिए भी जैमिंग तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जीपीएस जैमिंग की घटनाएं बढ़ती रहीं तो इससे समुद्री व्यापार और जहाज़ों की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।

