बुलंदशहर की शिखा गौतम का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने आईएएस बनने के अपने फर्जी दावे को लेकर सफाई दी। शिखा ने बताया कि उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम की पीडीएफ में केवल अपना नाम देखकर उत्साहित होकर परिजनों को चयन की सूचना दे दी, लेकिन बाद में पता चला कि चयन किसी दूसरी शिखा का हुआ है। उन्होंने स्वीकार किया कि बिना रोल नंबर जांचे केवल नाम सर्च करना उनकी गलती थी, जिसके कारण यह भ्रम पैदा हुआ।
शिखा गौतम के पिता प्रेमचंद ने बताया कि रिजल्ट आने के बाद शिखा ने उन्हें फोन कर अपने यूपीएससी में चयन की सूचना दी थी और अपना नाम देखकर वह भावुक हो गई थी, लेकिन बाद में पता चला कि सूची में दर्ज नाम किसी दूसरी शिखा का था। दरअसल, बुलंदशहर की रहने वाली शिखा ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 में 113वीं रैंक पाने का दावा किया था, जिससे उनकी सफलता की खबर तेजी से फैल गई। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की बेटी होने के कारण उनका ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं के साथ स्वागत हुआ, कई इंटरव्यू हुए और जुलूस भी निकाला गया, जबकि बाद में स्पष्ट हुआ कि चयन किसी दूसरी अभ्यर्थी का हुआ था।
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शिखा के दावे की जांच में सच आया सामने
दिल्ली की शिखा ने इस मामले में यूपीएससी को ईमेल भेजकर स्पष्टीकरण जारी करने की मांग की थी। इसके बाद आयोग ने बुलंदशहर की डीएम श्रुति को पूरे मामले की जांच के निर्देश दिए। जांच में सामने आया कि बुलंदशहर की शिखा का यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 113वीं रैंक पाने का दावा फर्जी था। वहीं असली चयन दिल्ली की रहने वाली शिखा का हुआ है, जो वर्तमान में हरियाणा में ब्लॉक विकास एवं पंचायत अधिकारी (बीडीपीओ) के पद पर कार्यरत हैं।
इससे पहले भी सिविल सेवा परीक्षा को लेकर ऐसा ही विवाद सामने आ चुका है। बिहार की आकांक्षा सिंह और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की आकांक्षा सिंह, दोनों ने 301वीं रैंक हासिल करने का दावा किया था। मामला बढ़ने पर आयोग ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी कर बताया कि 301वीं रैंक गाजीपुर, उत्तर प्रदेश की आकांक्षा सिंह को ही मिली है। वहीं रणवीर सेना प्रमुख रहे ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती बिहार की आकांक्षा सिंह का दावा जांच में गलत पाया गया था। इस खुलासे के बाद मामला काफी सुर्खियों में रहा और सोशल मीडिया पर भी इस पर काफी चर्चा हुई थी।
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