बीते साल हरियाणा के चर्चित आईएएस अधिकारी अशोक खेमका रिटायर हुए थे, जिनके करियर में 66 ट्रांसफर होने की बात कही जाती है और इसी वजह से उनकी पहचान भी बार-बार स्थानांतरण को लेकर बनी रही। रॉबर्ट वाड्रा भूमि सौदे सहित कई मामलों में चर्चा में रहे खेमका को एक सख्त और अलग मिजाज के अधिकारी के रूप में जाना गया। हालांकि, सबसे ज्यादा ट्रांसफर का रिकॉर्ड उनके नाम नहीं बल्कि हरियाणा के ही आईएएस अधिकारी प्रदीप कासनी के नाम है, जिन्हें अपने 33 साल के करियर में करीब 70 बार ट्रांसफर झेलना पड़ा, यानी औसतन वे एक पोस्टिंग पर छह महीने भी नहीं टिक पाए।
प्रदीप कासनी 2018 में रिटायर हुए थे, उस समय वे हरियाणा लैंड यूज बोर्ड में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के पद पर तैनात थे और उनकी आखिरी पोस्टिंग भी करीब छह महीने ही चली थी। रिटायरमेंट के बाद हरियाणा IAS ऑफिसर्स एसोसिएशन ने उन्हें टी पार्टी के लिए आमंत्रित किया, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए शामिल होने से इनकार कर दिया कि एसोसिएशन असली मुद्दों से भटक गई है और अधिकारियों की चुनौतियों पर बात नहीं करती। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी औपचारिकताओं का कोई वास्तविक महत्व नहीं है। कासनी अपने बेबाक रुख और स्पष्टवादिता के लिए भी जाने जाते रहे हैं, जो उनके पूरे प्रशासनिक करियर में नजर आई।
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अशोक खेमका जैसे बार-बार ट्रांसफर पर फिर छिड़ी बहस
दरअसल, इन अधिकारियों का जिक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि महाराष्ट्र के आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंधे इन दिनों चर्चा में हैं। देवेंद्र फडणवीस सरकार ने हाल ही में उनका तबादला किया, जो उनके 21 साल के करियर का 24वां ट्रांसफर है। इसी के साथ यह बहस फिर तेज हो गई कि किन अधिकारियों के सबसे ज्यादा ट्रांसफर हुए हैं, जिसमें अशोक खेमका और प्रदीप कासनी जैसे नाम सामने आते हैं। बार-बार होने वाले तबादलों को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था और कार्यशैली पर भी सवाल उठते रहे हैं। वहीं, ऐसे मामलों ने सिस्टम में स्थिरता और जवाबदेही को लेकर नई चर्चा को जन्म दिया है।
मुंबई स्थित मंत्रालय में दिव्यांग कल्याण विभाग के सचिव तुकाराम मुंधे का तबादला कर उन्हें राज्य सचिवालय में आपदा प्रबंधन, पुनर्वास, राजस्व और वन विभाग का सचिव बनाया गया है। उन्हें अगस्त 2025 में ही दिव्यांग कल्याण विभाग में नियुक्त किया गया था, यानी एक साल से भी कम समय में उनका फिर से ट्रांसफर हो गया। महाराष्ट्र के बीड़ जिले के रहने वाले मुंधे किसान परिवार से आते हैं और उन्होंने सरकारी स्कूल से पढ़ाई कर प्रशासनिक सेवा तक का सफर तय किया। लगातार तबादलों के कारण उनकी तुलना अब अशोक खेमका से की जा रही है और उन्हें महाराष्ट्र का ‘खेमका’ भी कहा जाने लगा है।
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