बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद एनडीए ने नई रणनीति अपनाई है। इसके तहत सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया है। वहीं, विजय चौधरी और बिजेंद्र यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। इस बदलाव से सत्ता का संतुलन भी बदल गया है। पहले नीतीश कुमार केंद्र में थे, लेकिन अब बीजेपी अग्रणी भूमिका में है और जेडीयू सहयोगी के रूप में साथ है।
इसके अलावा, इस नई ‘त्रिमूर्ति’ के जरिए एनडीए ने राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश की है। सम्राट चौधरी (कोइरी), विजय चौधरी (भूमिहार) और बिजेंद्र यादव (यादव) को प्रमुख पद दिए गए हैं। इस तरह, अलग-अलग जातीय समूहों को जोड़ने की रणनीति अपनाई गई है, ताकि संतुलन बना रहे।
दरअसल, बिहार की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों पर आधारित रही है। मंडल राजनीति के बाद ओबीसी वर्ग का प्रभाव बढ़ा। इसी दौरान, लालू यादव ने यादव और मुस्लिम वोटों के सहारे मजबूत पकड़ बनाई। हालांकि, इसके जवाब में नीतीश कुमार ने ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) समीकरण तैयार किया। इससे राजनीतिक संतुलन बदला और एनडीए को मजबूती मिली।
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सत्ता की त्रिमूर्ति का उदय
अब, इसी रणनीति को नए रूप में लागू किया जा रहा है। एनडीए कोइरी, यादव और भूमिहार समुदायों को साथ लाने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही, ओबीसी और सवर्ण वर्गों में संतुलन बनाने पर जोर है। इसलिए, यह समीकरण चुनावी राजनीति में अहम माना जा रहा है।
अंत में, इस कदम का उद्देश्य लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की संभावनाओं को सीमित करना है। साथ ही, एनडीए की यह सामाजिक इंजीनियरिंग विपक्ष के लिए चुनौती बन सकती है। ऐसे में, विपक्ष को नई रणनीति तैयार करनी पड़ सकती है।
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