नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार सरकारी स्कूलों में छात्रों का नामांकन घटा है। पहली बार यह संख्या 50 प्रतिशत से नीचे पहुंची है। कई परिवार निजी स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। वे बेहतर शिक्षा और अवसरों की उम्मीद करते हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में भरोसे का मुद्दा चर्चा में है। भारत ने लंबे समय तक स्कूलों का विस्तार किया। साथ ही नामांकन बढ़ाने पर भी ध्यान दिया। हालांकि सीखने के परिणाम अभी भी संतोषजनक नहीं हैं। रिपोर्ट बताती है कि कई छात्र बुनियादी पढ़ाई और गणित में कठिनाई महसूस करते हैं। इसलिए केवल भवन बनाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
निजी सरकारी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान, सीखने की गुणवत्ता, शिक्षक कमी और बुनियादी सुविधाएं बनीं बड़ी चुनौती
दूसरी ओर माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट की समस्या बनी हुई है। आर्थिक दबाव इसके प्रमुख कारणों में शामिल है। इसके अलावा कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल दूर स्थित हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। उदाहरण के लिए लड़कियों के लिए उपयोगी शौचालय उपलब्ध नहीं हैं। भरोसे चल रहे हैं। नतीजतन शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसके साथ ही शहर और गांव के बीच शिक्षा का अंतर भी बढ़ रहा है।
इस बीच डिजिटल शिक्षा और एआई पर जोर बढ़ा है। हालांकि विशेषज्ञ संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि तकनीक शिक्षकों की मदद कर सकती है। लेकिन तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं बन सकती। इसलिए शिक्षा सुधार में दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूल सामाजिक समानता का मजबूत माध्यम हैं। इसलिए इन स्कूलों को अधिक संसाधन और बेहतर शिक्षक चाहिए। साथ ही समुदाय का भरोसा भी मजबूत करना होगा। तभी हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकेगी।
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