थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि भविष्य की संचालन आवश्यकताओं, वास्तविक अनुभवों और सैनिकों की भूमिका को ध्यान में रखते हुए अग्निपथ योजना में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य के आकलन से यह साबित होता है कि अग्निवीरों को लंबे समय तक सेवा में बनाए रखना रक्षा बलों की क्षमता बढ़ाने में मददगार होगा, तो सरकार और सेना इस दिशा में उचित निर्णय ले सकती हैं। उनके अनुसार किसी भी बदलाव का आधार पहले से तय आंकड़े नहीं, बल्कि सैन्य जरूरतें, अनुभव और बदलते सुरक्षा हालात होंगे।जनरल द्विवेदी ने अग्निपथ योजना को मानव संसाधन सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य युवा, शारीरिक रूप से मजबूत, मानसिक रूप से फुर्तीले और तकनीकी रूप से कुशल सैनिक तैयार करना है।
अग्निपथ योजना: बदलते युद्ध स्वरूप के लिए सेना तैयार
उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहे हैं और नई तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए सेना को ऐसे सैनिकों की आवश्यकता है, जो नई चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें। उन्होंने यह भी कहा कि योजना अभी शुरुआती चरण में है, क्योंकि पहले बैच ने अपना चार वर्षीय कार्यकाल पूरा नहीं किया है। इसलिए इसके प्रभाव का अंतिम आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी।
चीन के साथ सीमा स्थिति पर जनरल द्विवेदी ने कहा कि हालात स्थिर हैं, लेकिन संवेदनशील बने हुए हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच गलतफहमियां दूर करने और सीमा संबंधी मुद्दों का समाधान करने के लिए हर वर्ष 1,100 से अधिक बैठकें होती हैं।उन्होंने अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को बताया, जिसने भारतीय सेना की संयुक्त और भविष्य के लिए तैयार युद्ध क्षमता को प्रदर्शित किया। साथ ही उन्होंने खुफिया, निगरानी और टोही क्षमताओं को मजबूत करने के लिए ‘बाज़ बटालियन’ के गठन की घोषणा की। यह विशेष इकाई ड्रोन प्रणालियों के संचालन और प्रबंधन में प्रशिक्षित सैनिक तैयार करेगी। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना पाकिस्तान की ड्रोन गतिविधियों पर लगातार नजर रख रही है और हर उभरते खतरे का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
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