भारत-अमेरिका ट्रेड डील ब्रेक अचानक लिया गया फैसला नहीं था। दरअसल, यह बदलते वैश्विक हालात को देखते हुए उठाया गया कदम था। जब नई दिल्ली ने वाशिंगटन की बैठक टाली, तब तक अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आ चुका था। इस फैसले ने राष्ट्रपति के टैरिफ अधिकारों को सीमित कर दिया। इसका सीधा असर पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump की व्यापार नीति पर पड़ा।
इसके बाद अमेरिका ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 लागू की। इसके तहत 150 दिनों के लिए 15% अस्थायी टैक्स लगाया गया। इसलिए भारत-अमेरिका ट्रेड डील ब्रेक और भी अहम हो गया। पुरानी शर्तों पर बातचीत जारी रखना अब संभव नहीं था।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील ब्रेक और कानूनी अनिश्चितता
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने नीति की स्थिरता पर सवाल खड़े किए। हालांकि टैक्स अस्थायी बताया गया है, लेकिन भविष्य अभी साफ नहीं है। भारत यह जानना चाहता है कि 150 दिन बाद क्या होगा। साथ ही, अमेरिकी कांग्रेस का रुख भी महत्वपूर्ण है। अगर टैक्स बदलता है, तो पूरी डील का गणित बदल जाएगा। इसलिए भारत-अमेरिका ट्रेड डील ब्रेक एक एहतियाती कदम माना जा रहा है। यह पीछे हटना नहीं, बल्कि समय लेना है।
बदलता सौदेबाज़ी संतुलन
फरवरी की शुरुआत में अमेरिका मजबूत स्थिति में था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तस्वीर बदल गई। अब अमेरिकी प्रशासन की सौदेबाज़ी शक्ति सीमित दिखती है। क्योंकि किसी भी रियायत को कानूनी चुनौती मिल सकती है। दरअसल, समझौते का बड़ा हिस्सा तैयार था। फिर भी खेती, डेटा और बौद्धिक संपदा जैसे मुद्दे टैरिफ पर निर्भर थे। जब मूल टैक्स ढांचा बदल गया, तो बातचीत भी रुक गई।
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रणनीतिक धैर्य का संकेत
पिछले साल भारत का निर्यात 6.8% बढ़ा। यह 86 अरब डॉलर तक पहुंच गया। साथ ही, 2024 में कुल द्विपक्षीय व्यापार 212 अरब डॉलर से अधिक रहा। इसलिए भारत पर तात्कालिक दबाव नहीं है। फिलहाल भारत-अमेरिका ट्रेड डील ब्रेक एक संदेश देता है। भारत जल्दबाज़ी में फैसला नहीं करेगा। इसके बजाय, वह स्थिरता और भरोसे को प्राथमिकता देगा। आज के दौर में व्यापार सिर्फ टैक्स का खेल नहीं है। बल्कि यह भरोसे और नियमों का भी सवाल है।
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