भारतीय नौसेना ने अपनी समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अत्याधुनिक पनडुब्बी रोधी युद्धपोत INS मंगरोल को बेड़े में शामिल कर लिया है। कोच्चि स्थित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने इस युद्धपोत का निर्माण किया है। आधुनिक हथियारों, उन्नत सेंसरों और निगरानी प्रणालियों से लैस INS मंगरोल खासतौर पर उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे निपटने में मदद करेगा। भारतीय नौसेना ने इस पोत को तटीय क्षेत्रों में पानी के भीतर मौजूद खतरों से मुकाबला करने के लिए तैयार किया है। इसकी तैनाती से नौसेना को उन समुद्री इलाकों में निगरानी और सुरक्षा अभियान चलाने में मदद मिलेगी, जहां बड़े युद्धपोतों को संचालन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वत्सायन ने इसके नौसेना में शामिल होने के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की।
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मंगरोल नौसेना में शामिल, समुद्री सुरक्षा को मिलेगी मजबूती
INS मंगरोल पनडुब्बी रोधी उथले जल युद्धपोत (ASW-SWC) श्रेणी का तीसरा पोत है। नौसेना इसे तटीय समुद्री क्षेत्रों में पानी के भीतर होने वाली संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने और संभावित खतरों को बेअसर करने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। यह युद्धपोत समुद्री गश्ती विमानों, हेलीकॉप्टरों और अन्य नौसैनिक जहाजों के साथ समन्वय बनाकर काम कर सकता है। इससे नौसेना को समुद्र के भीतर दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर तेजी से कार्रवाई करने में मदद मिलेगी। तीन डीजल इंजनों और वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली से लैस यह पोत उथले पानी में बेहतर गति और दिशा बदलने की क्षमता रखता है। इसकी बनावट और प्रणोदन प्रणाली इसे सीमित समुद्री क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से संचालन करने में मदद करती है। इसके अलावा, नौसेना इसे समुद्री निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और बारूदी सुरंगों से संबंधित कार्यों में भी इस्तेमाल कर सकती है।
INS मंगरोल की युद्धक क्षमता बढ़ाने के लिए नौसेना ने इसमें कई आधुनिक हथियार और सेंसर लगाए हैं। इनमें अभय हल-माउंटेड सोनार, हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर और मारीच उन्नत टॉरपीडो डिकॉय सिस्टम शामिल हैं। सोनार पानी के भीतर मौजूद वस्तुओं और पनडुब्बियों की गतिविधियों का पता लगाने में मदद करता है। हल्के टॉरपीडो और पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर दुश्मन की पनडुब्बियों के खिलाफ कार्रवाई करने की क्षमता प्रदान करते हैं। वहीं, मारीच डिकॉय सिस्टम दुश्मन के टॉरपीडो को भटकाने और युद्धपोत की सुरक्षा बढ़ाने में मदद करता है। इन प्रणालियों के जरिए INS मंगरोल पानी के भीतर मौजूद खतरों का पता लगाने, उनकी निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करने में नौसेना की सहायता करेगा।
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उथले समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों का लगाएगा पता
नौसेना ने इस युद्धपोत का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय शहर मंगरोल के नाम पर रखा है। यह शहर मछली पकड़ने के प्रमुख बंदरगाहों में गिना जाता है। नया INS मंगरोल अपने पूर्ववर्ती INS मंगरोल (M85) की विरासत को भी आगे बढ़ाता है। पुराने पोत ने भारतीय नौसेना में बारूदी सुरंग-रोधी युद्धपोत के रूप में सेवाएं दी थीं और अप्रैल 2004 तक नौसेना का हिस्सा रहा था। नए युद्धपोत का नामकरण नौसेना की उस परंपरा को दर्शाता है, जिसके तहत वह अपने पुराने पोतों की विरासत को आगे बढ़ाती है। इसके साथ ही, INS मंगरोल का निर्माण भारत की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता में बढ़ोतरी को भी प्रदर्शित करता है। नौसेना के अनुसार, इसके निर्माण में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है। यह उपलब्धि भारत में युद्धपोतों के डिजाइन, निर्माण और आधुनिक हथियार प्रणालियों के एकीकरण की बढ़ती क्षमता को रेखांकित करती है।
INS मंगरोल की तैनाती ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब समुद्री सुरक्षा के लिए पानी के भीतर मौजूद खतरों की निगरानी करना लगातार अहम होता जा रहा है। यह युद्धपोत तटीय क्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी अभियानों को मजबूती देने के साथ-साथ नौसेना के व्यापक समुद्री सुरक्षा अभियानों में भी योगदान देगा। इससे पहले अगस्त 2026 में भारतीय नौसेना ने INS निपुण को भी अपने बेड़े में शामिल किया था। यह जहाज गहरे समुद्र में विशेष अभियानों को अंजाम देने, खराब मौसम में स्थिरता बनाए रखने और संकट में फंसी पनडुब्बियों से नौसैनिकों को निकालने जैसे कार्यों के लिए तैयार किया गया है। INS निपुण और INS मंगरोल जैसे पोत भारतीय नौसेना की अलग-अलग परिचालन जरूरतों को पूरा करते हैं।
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