काठमांडू के मेयर बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बनने की ओर बढ़ रहे हैं। 35 साल की उम्र में वे देश के सबसे युवा नेताओं में शामिल होंगे।
जेन ज़ी आंदोलन के कारण इस बार नेपाल की संसद पहले से ज्यादा युवा हो गई है। पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड को छोड़कर कोई अन्य पूर्व पीएम संसद में नहीं होगा।
बालेन शाह के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) इस बार अपने दम पर सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है। नेपाल की 275 सीटों वाली संसद में सरकार बनाने के लिए 138 सीटें चाहिए, जबकि आरएसपी 180 से अधिक सीटें जीतने की ओर बढ़ती दिख रही है।
चीन को लेकर बालेन शाह का रुख कैसा रहेगा?
बालेन शाह ने झापा के दमक में प्रस्तावित नेपाल-चीन फ्रेंडशिप इंडस्ट्रियल पार्क परियोजना को अपने चुनावी घोषणापत्र से हटा दिया। इसी झापा-5 सीट से उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को हराया था। इस परियोजना और बीआरआई को लेकर भारत की चिंताएँ पहले से ही सामने आती रही हैं।
घोषणापत्र से परियोजना हटाने के बाद इंडस्ट्रियल पार्क के अध्यक्ष गोविन्द थापा ने फेसबुक पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि दमक, कमल और गौरादह क्षेत्र में बनने वाले इस पार्क के निर्माण में देरी विदेशी बाधाओं के कारण हो रही है, न कि नेपाल के भीतर किसी समस्या की वजह से।
थापा ने यह भी कहा कि चीनी निवेश को लेकर किसी अन्य देश की आपत्ति समझना नेपाली जनता के लिए कठिन है।
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भारत के लिए बालेन शाह कितने अहम होंगे?
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक लोकराज बराल द्वारा कहा गया कि बालेन शाह का नाम उन्हें मेयर बनने से पहले पता नहीं था। मेयर के रूप में उनके काम को भी पूरी तरह समझ पाना कठिन बताया गया।
इसके अलावा, यह भी कहा गया कि चुनाव से पहले बालेन आरएसपी में शामिल हुए थे। आरएसपी में पढ़े-लिखे लोगों की मौजूदगी मानी जाती है। हालांकि, बालेन द्वारा खुद को काफी रिज़र्व रखा गया है। मीडिया से बातचीत कम की गई है। सार्वजनिक बहसों में भी उन्हें कम ही सुना गया है।
बराल द्वारा यह भी उल्लेख किया गया कि बालेन शाह की टोपी पर खुखरी का चिन्ह दिखाया जाता है। वहीं उन्हें मधेसी पृष्ठभूमि से माना जाता है।
इसके अलावा, उनके एक पुराने फेसबुक स्टेटस का भी जिक्र किया गया। उसमें भारत, अमेरिका और आरएसपी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी होने की बात कही गई। बराल के अनुसार, बालेन का व्यवहार अब तक अप्रत्याशित माना गया है। इसलिए उनके बारे में कोई स्पष्ट भविष्यवाणी करना कठिन बताया गया।
इस बीच, नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत रंजीत राय द्वारा कहा गया कि काठमांडू का मेयर होना अलग बात है। वहीं नेपाल का प्रधानमंत्री होना बिल्कुल अलग जिम्मेदारी है।
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