नेपाल ने हाल ही में लिपुलेख दर्रे को लेकर फिर से विवादित बयान देकर तनाव बढ़ा दिया, लेकिन इसके बावजूद भारत ने पड़ोसी देश की मदद का हाथ नहीं छोड़ा। वैश्विक स्तर पर खाद की कीमतों में भारी उछाल और कमी के संकट के बीच भारत अब नेपाल को कम दाम पर खाद उपलब्ध कराने जा रहा है। खेती के सीजन से पहले नेपाल में उर्वरकों की कमी गंभीर स्तर तक पहुंच गई है, जिससे वहां की सरकार चिंतित है। नेपाल की सरकार ने हाल में लिपुलेख दर्रे को लेकर अपना दावा दोहराया था। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए इस्तेमाल होने वाला यह दर्रा भारत का हिस्सा माना जाता है, जबकि नेपाल लंबे समय से इस पर दावा करता रहा है।
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खाद संकट में भारत बना नेपाल का सहारा
ऐसे में दोनों देशों के रिश्तों में विरोध और सहयोग दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल में बुवाई का समय नजदीक है और देश को करीब 2.5 लाख टन खाद की आवश्यकता है, जबकि उपलब्ध स्टॉक काफी कम है। वैश्विक बाजार से खाद खरीदने पर नेपाल सरकार पर भारी सब्सिडी का बोझ पड़ता, जिसे संभालना उसके लिए मुश्किल माना जा रहा है। इसी संकट को देखते हुए नेपाल ने National Chemicals and Fertilizers Limited के साथ सरकार-से-सरकार समझौता किया है। इसके तहत नेपाल को 60 हजार टन यूरिया और 20 हजार टन डीएपी उपलब्ध कराया जाएगा।
दूसरी ओर भारत खुद भी महंगे दामों पर खाद खरीदने को मजबूर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतें हाल के महीनों में लगभग दोगुनी हो चुकी हैं। इसके बावजूद भारत, 2022 के समझौते के तहत नेपाल को पुराने और अपेक्षाकृत सस्ते दामों पर खाद देने की प्रतिबद्धता निभा रहा है। इससे साफ है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद भारत ने पड़ोसी देश की खाद सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।
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