दिल्ली में आवारा कुत्तों का मुद्दा एक बार फिर गरमाया हुआ नज़र आ रहा है।कुत्तों के काटने और हमले की घटनाओं से आम लोग डरे हुए महसूस कर रहे हैं।सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले को गंभीर मानते हुए स्वत: संज्ञान में लिया है।अदालत ने स्पष्ट किया कि मासूम बच्चों की जान की भरपाई कोई नहीं कर सकता।रेबीज से मरने वाले बच्चों को कोई पशु प्रेमी वापस नहीं ला सकता है।इसलिए कोर्ट ने आदेश दिए कि दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से कुत्ते हटाए जाएं।कुत्तों को पकड़कर तुरंत शेल्टर होम में स्थानांतरित करने के निर्देश जारी किए गए।साथ ही उनकी नसबंदी और टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिए भी कहा गया है।कोर्ट ने दिल्ली प्रशासन को सख्ती से कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।यह फैसला बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया।
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मुंबई में कबूतरों को दाना खिलाने पर रोक, धार्मिक संगठनों का विरोध शुरू
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस कार्य में कोई बाधा ना डाले।जो लोग कुत्ते पकड़ने से रोकेंगे, उन पर अवमानना की कार्रवाई होगी।यह चेतावनी पशु प्रेमियों और कुछ संगठनों को सीधा संदेश देती है।अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा किसी भी व्यक्तिगत भावना से अधिक ज़रूरी है।लोगों की ज़िंदगी और स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जा सकता है।सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पूरे दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में लागू रहेगा।प्रशासन को आदेश का पालन करने के लिए आठ सप्ताह का समय मिला है।इसके तहत एक हेल्पलाइन भी बनाई जाएगी जो डॉग बाइट मामलों में मदद करेगी।शहर की नगरपालिकाओं को निर्देशित किया गया है कि वे रिपोर्टिंग सिस्टम सुधारें।कोर्ट ने कहा कि समस्या पर तुरंत और प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।
मुंबई में भी पशुओं को लेकर विवाद दूसरी दिशा में सामने आया है।यहां बॉम्बे हाईकोर्ट ने कबूतरों को दाना खिलाने पर रोक लगा दी है।कोर्ट ने कहा कि कबूतरों की वजह से सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा पहुंच रहा है।विशेषकर फेफड़ों से संबंधित बीमारियों में इनकी भूमिका चिंताजनक है।कोर्ट ने राज्य सरकार को कबूतरखानों को हटाने का निर्देश दिया है।साथ ही नियमों के उल्लंघन पर एफआईआर दर्ज करने की भी अनुमति दी है।मुंबई में यह मुद्दा धार्मिक आस्था और परंपरा से भी जुड़ा हुआ है।कुछ समुदाय विशेष इसे धर्म और मान्यताओं से जोड़कर देख रहे हैं।इस फैसले के बाद कई संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं।एक जैन मुनि ने भूख हड़ताल करने की चेतावनी तक दे डाली है।
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जानवरों और इंसानों के सहअस्तित्व पर नई बहस
दिल्ली और मुंबई दोनों शहरों में जानवरों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ गई है।सड़क पर रहने वाले जानवरों से आम नागरिकों को परेशानी हो रही है।कोर्ट का हस्तक्षेप इन मुद्दों को गंभीरता से देखने की ओर संकेत करता है।जहां एक ओर सुरक्षा है, वहीं दूसरी ओर परंपरा और संवेदना भी हैं।संतुलन बनाना प्रशासन और अदालतों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।पशु अधिकार कार्यकर्ता चाहते हैं कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए।वहीं आम जनता चाहती है कि उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।इन मुद्दों ने समाज में पशु-मानव सहअस्तित्व पर नई बहस छेड़ दी है।अभी यह देखना होगा कि इन मामलों का अंतिम समाधान क्या निकलता है।जनता, अदालत और कार्यकर्ता — तीनों की भूमिका इसमें अहम साबित होगी।
इस पूरे विवाद ने देशभर में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है।क्या शहरों में आवारा जानवरों का होना मानवीय है या खतरनाक?क्या धार्मिक आस्था के नाम पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से समझौता किया जा सकता है?इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन बहस ज़रूर तेज़ है।न्यायपालिका का हस्तक्षेप कई बार ज़रूरी लेकिन विवादास्पद हो जाता है।जनता को भी चाहिए कि वे इस मुद्दे पर संवेदनशीलता से सोचें।सरकारों को नीति बनाते समय व्यावहारिकता और संवेदना का संतुलन रखना होगा।सामाजिक संगठनों को भी आगे आकर समाधान की दिशा में काम करना होगा।शहरों में जानवरों के लिए एक मानवीय व्यवस्था बनाना अब ज़रूरी हो गया है।यह सिर्फ एक कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी बन चुका है।
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