शादी के बाद पत्नी की हत्या से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से कड़े सवाल किए। अदालत ने नाराज़गी जताते हुए कहा कि ऐसे फैसलों को समझ पाना मुश्किल है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि दहेज मृत्यु जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद आरोपी पति को जमानत क्यों दी गई। अदालत ने इस पर चिंता जताई कि आरोपी कई महीनों तक जेल में रहने के बाद जमानत पर रिहा हो गया। इस फैसले के खिलाफ मृतका के पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और जमानत रद्द करने की मांग की। मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के निर्णय पर सख्त रुख अपनाया।
अदालत ने आरोपी की जमानत रद्द करते हुए उसे एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही, निचली अदालत को एक वर्ष के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी करने का आदेश भी दिया गया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का भी अवलोकन किया, जिसमें गर्दन के पास चोट के निशान पाए जाने की बात सामने आई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील से भी सवाल किए। जवाब में सरकारी पक्ष ने कहा कि वह इस मामले में विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करेगा।
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सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: संदिग्ध मौत मामले में जमानत पर उठाए कड़े सवाल
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पारदीवाला ने बचाव पक्ष से कड़े सवाल पूछते हुए कहा कि शादी के सात साल के भीतर हुई संदिग्ध मौत और गंभीर आरोपों के बावजूद जमानत क्यों दी गई। उन्होंने कमजोर दलीलों पर नाराज़गी जताते हुए मामले के मूल मुद्दे पर जवाब देने को कहा। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मृतका घर में संदिग्ध हालात में मिली थी और उसके शरीर पर चोट के निशान थे। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी से पत्नी की मौत पर स्पष्टीकरण मांगा और दहेज हत्या के आरोपों को गंभीर मानते हुए सख्त रुख अपनाया।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पारदीवाला ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए कहा कि समझ से परे है कि जिन मामलों में जमानत नहीं दी जानी चाहिए, उनमें भी राहत दे दी जाती है।राज्य की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि आरोपी 18 महीने तक हिरासत में रहा है, जिस पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कहा कि यह हत्या का मामला है, जिसमें गला घोंटने के आरोप हैं, और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा करती है। अदालत ने वकील को मामले की गंभीरता समझने को कहा और सबूतों, खासकर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, पर ध्यान देने की बात कही।
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