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    डिवाइस फार्मिंग

    भारत में ऑनलाइन शॉपिंग लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। लेकिन जैसे-जैसे डिजिटल लेनदेन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे साइबर ठगी के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। अब पारंपरिक OTP और कॉल वाले स्कैम पीछे छूट रहे हैं। उनकी जगह एक नया और ज्यादा संगठित फ्रॉड मॉडल उभरकर सामने आया है, जिसे एक्सपर्ट्स “जामताड़ा स्टाइल ई-कॉमर्स फ्रॉड” कह रहे हैं।

    झारखंड का जामताड़ा लंबे समय से साइबर ठगी के लिए कुख्यात रहा है। वहां से संचालित गैंग्स ने फोन कॉल, फर्जी लिंक और OTP के जरिए देश-विदेश में लोगों को निशाना बनाया। इसी पर आधारित वेब सीरीज ‘Jamtara: Sabka Number Ayega’ भी बन चुकी है। अब ठगों ने अपना तरीका बदल लिया है। वे सीधे लोगों को कॉल नहीं कर रहे, बल्कि टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन के जरिए ई-कॉमर्स सिस्टम को ही निशाना बना रहे हैं।

    क्या है डिवाइस फार्मिंग?

    हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साइबर गैंग अब “डिवाइस फार्मिंग” तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें ठग एक साथ सैकड़ों या हजारों मोबाइल फोन या वर्चुअल डिवाइस ऑपरेट करते हैं। ये डिवाइस मिलकर बड़े पैमाने पर फर्जी अकाउंट बनाते हैं और ई-कॉमर्स वेबसाइट्स के ऑफर्स का दुरुपयोग करते हैं।

    उदाहरण के तौर पर, अगर किसी शॉपिंग ऐप पर पहले ऑर्डर पर 500 रुपये की छूट मिलती है, तो एक आम यूजर इस ऑफर का एक बार फायदा उठाता है। लेकिन ये गैंग हजारों फर्जी अकाउंट बनाकर हर बार खुद को “नया यूजर” दिखाते हैं और बार-बार वही डिस्काउंट हासिल कर लेते हैं। इससे कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान होता है।

    ऑटोमेशन से चलता है पूरा नेटवर्क

    पहले ठग सीधे लोगों को फोन करके OTP हासिल करते थे। अब वे सिस्टम को ऑटोमेशन से चकमा दे रहे हैं। डिवाइस फार्म में हजारों स्मार्टफोन, सिम कार्ड और अकाउंट एक साथ सक्रिय रहते हैं। ये नेटवर्क न सिर्फ फर्जी ऑर्डर प्लेस करता है, बल्कि बॉट पंपिंग और फेक रिव्यू जैसे काम भी करता है।

    स्कैमर्स फर्जी अकाउंट्स के जरिए किसी प्रोडक्ट की रेटिंग बढ़ाते हैं या बड़ी संख्या में नेगेटिव रिव्यू देकर रेटिंग गिरा देते हैं। इससे मार्केट में गलत धारणा बनती है और असली ग्राहकों का भरोसा प्रभावित होता है।

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    संगठित ‘बिजनेस मॉडल’ बन चुका है फ्रॉड

    रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस फ्रॉड के पीछे पूरा नेटवर्क काम करता है। कुछ लोग फर्जी सिम कार्ड की व्यवस्था करते हैं, कुछ अकाउंट बनाते हैं, और कुछ ऑर्डर किए गए सामान को आगे बेच देते हैं। यानी यह अब सिर्फ ठगी नहीं, बल्कि एक संगठित बिजनेस मॉडल बन चुका है।

    इसी वजह से इसे “जामताड़ा 2.0” कहा जा रहा है। सोच भले ही पुरानी हो, लेकिन तरीका पूरी तरह आधुनिक और टेक्नोलॉजी आधारित है। अब ठग सीधे लोगों को नहीं, बल्कि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बैकएंड सिस्टम को निशाना बना रहे हैं।

    आम ग्राहकों पर भी पड़ता है असर

    इस तरह के फ्रॉड का असर केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। जब कंपनियां लगातार नुकसान झेलती हैं, तो वे डिस्काउंट और ऑफर्स कम कर देती हैं। नतीजतन, असली यूजर्स को कम फायदे मिलते हैं और कीमतें बढ़ सकती हैं। अंततः इसकी कीमत आम ग्राहकों को चुकानी पड़ती है।

    फ्रॉड डिटेक्शन बना बड़ी चुनौती

    डिवाइस फार्मिंग को पकड़ना आसान नहीं है। हर अकाउंट अलग दिखता है, हर डिवाइस नया नजर आता है और पूरा ऑपरेशन ऑटोमेटेड सिस्टम से चलता है। यही कारण है कि ई-कॉमर्स कंपनियां अब AI और एडवांस्ड सिक्योरिटी टूल्स का सहारा ले रही हैं।

    हालांकि यह एक तरह की टेक्नोलॉजी रेस बन चुकी है। एक ओर कंपनियां अपने सिस्टम को मजबूत कर रही हैं, तो दूसरी ओर स्कैमर्स नए-नए तरीके खोज रहे हैं।

    स्पष्ट है कि जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे साइबर अपराध भी अधिक स्मार्ट और संगठित होते जा रहे हैं। अब खतरा सिर्फ कॉल या लिंक से नहीं, बल्कि उन अदृश्य सिस्टम्स से है जो पर्दे के पीछे काम करते हैं और चुपचाप बड़ा नुकसान पहुंचाते हैं।

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    One thought on “ई-कॉमर्स सेक्टर में अलर्ट: डिवाइस फार्मिंग बना नई साइबर चुनौती”

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