पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को अस्थायी रूप से निलंबित किया। पाकिस्तान लगातार इस फैसले का विरोध कर रहा है। वह पूरे विवाद का दोष भारत पर डाल रहा है। पाकिस्तान के नेताओं ने दावा किया कि भारत समझौते को संशोधित या समाप्त नहीं कर सकता। दूसरी तरफ भारत ने आतंकवाद से जुड़ी गंभीर चिंताओं को आधार बनाया। भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा हर देश की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। उनका मानना है कि लगातार आतंकी घटनाओं ने भारत की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ाई हैं। इसलिए भारत को आवश्यक और वैध कदम उठाने का अधिकार है। विशेषज्ञों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन दोनों पक्षों की जिम्मेदारी होती है। सुरक्षा परिस्थितियां बदलने पर देश अपनी नीतियों की समीक्षा भी करते हैं। इसी कारण भारत का फैसला चर्चा का प्रमुख विषय बना।
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ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के बाहर होने का मामला
भारत ने अपने पक्ष के समर्थन में कई अंतरराष्ट्रीय उदाहरण दिए। पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर ने कहा कि बड़ी शक्तियां राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती हैं। उन्होंने अमेरिका, रूस और चीन के फैसलों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन देशों ने सुरक्षा कारणों से महत्वपूर्ण समझौतों से दूरी बनाई। उनके अनुसार भारत भी ऐसा कदम उठा सकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा हर सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संधियां परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं। लगातार गंभीर चुनौतियां आने पर नीति परिवर्तन संभव माना जाता है। भारत ने भी आतंकवाद को अपनी सबसे बड़ी चिंता बताया। इसी आधार पर भारत ने सिंधु जल समझौते का अस्थायी निलंबन उचित ठहराया।
सिंधु जल समझौता वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था। विश्व बैंक ने इस जल बंटवारा समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। समझौते के तहत छह प्रमुख नदियों का उपयोग तय किया गया। रावी, ब्यास और सतलुज का अधिकांश जल भारत को मिला। सिंधु, झेलम और चेनाब के मुख्य उपयोग का अधिकार पाकिस्तान को मिला। कई दशकों तक यह समझौता जल प्रबंधन का आधार बना रहा। भारत लंबे समय से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर चिंता जताता रहा है। भारत ने कई बार समझौते की समीक्षा की मांग भी उठाई। सरकार का मानना है कि बदलती सुरक्षा परिस्थितियों में नीतियों का मूल्यांकन जरूरी होता है। इसी वजह से यह समझौता फिर चर्चा के केंद्र में आ गया।
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INF संधि खत्म होने के पीछे अमेरिका और रूस की दलीलें
भारत के समर्थन में अमेरिका का ईरान परमाणु समझौते से बाहर होना भी उदाहरण बना। वर्ष 2018 में अमेरिका ने JCPOA से खुद को अलग कर लिया। तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते का विरोध किया। उन्होंने इसे अमेरिका के हितों के खिलाफ बताया। अमेरिका ने दावा किया कि समझौता सुरक्षा चिंताओं का समाधान नहीं करता। इसी तरह अमेरिका और रूस के बीच हुई INF संधि भी समाप्त हो गई। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर संधि उल्लंघन के आरोप लगाए। रूस ने बदलते सुरक्षा माहौल का हवाला दिया। इन घटनाओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता को रेखांकित किया। भारतीय विशेषज्ञ इन्हीं उदाहरणों के आधार पर भारत के फैसले को उचित बताते हैं।
चीन ने भी दक्षिण चीन सागर विवाद में अंतरराष्ट्रीय फैसले को नहीं माना। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून के तहत आए निर्णय को चीन ने खारिज किया। चीन ने कहा कि यह विवाद संप्रभुता से जुड़ा है। उसने ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया। चीन ने द्विपक्षीय बातचीत को बेहतर समाधान बताया। इन उदाहरणों से राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता स्पष्ट होती है। भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि भारत भी अपनी सुरक्षा चिंताओं को मजबूती से रख सकता है। उनका मानना है कि आतंकवाद किसी भी समझौते को प्रभावित कर सकता है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा ले सकता है। फिर भी राष्ट्रीय सुरक्षा अक्सर कूटनीतिक फैसलों को दिशा देती है।
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