हर्ष मंदर नफ़रती भाषा हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई को लोकतंत्र की रक्षा के लिए ज़रूरी मानते हैं। उनका कहना है कि नफ़रत भरे भाषण आगे चलकर हिंसा और भेदभाव का रास्ता बनाते हैं।
नफ़रती भाषा के ख़िलाफ़ हर्ष मंदर की क़ानूनी पहल
मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज कर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर की मांग की है। उनका आरोप है कि संवैधानिक पद पर रहते हुए सरमा लगातार अल्पसंख्यक मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाली भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। मंदर का कहना है कि ऐसे बयान सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं होते, बल्कि वे समाज में नीचे तक नफ़रत का संदेश भेजते हैं।
शिकायत के बाद हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे मंदर के ख़िलाफ़ सौ से अधिक एफ़आईआर दर्ज करवा सकते हैं। इसके बावजूद हर्ष मंदर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और कहते हैं कि धमकियों से उनकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकती।
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क्यों नफ़रत अब राजनीति की रणनीति बनती जा रही है
हर्ष मंदर का मानना है कि भारत में नफ़रती भाषण अब अपवाद नहीं रहे, बल्कि रोज़मर्रा की राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं। विभिन्न रिपोर्टें दिखाती हैं कि बीते वर्षों में नफ़रती भाषणों की घटनाओं में तेज़ बढ़ोतरी हुई है, जिनका सबसे बड़ा निशाना धार्मिक अल्पसंख्यक—ख़ासतौर पर मुसलमान और ईसाई—रहे हैं।
मंदर कहते हैं कि हिंसा कभी अचानक नहीं होती। पहले नफ़रत भरे शब्द फैलते हैं, फिर अफ़वाहें बनती हैं और अंत में हिंसा को अंजाम दिया जाता है। वे नाज़ी जर्मनी का उदाहरण देते हुए चेतावनी देते हैं कि नरसंहार गैस चैंबर से नहीं, बल्कि नफ़रती भाषण से शुरू होता है। उनके अनुसार, जब सत्ता नफ़रत को अनदेखा करती है या उसे बढ़ावा देती है, तो वह हिंसा के लिए ज़मीन तैयार करती है।
सत्ता, प्रशासन और समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी
हर्ष मंदर प्रशासनिक अनुभव के आधार पर कहते हैं कि दंगे और सांप्रदायिक हिंसा सरकार की सहमति या निष्क्रियता के बिना लंबे समय तक नहीं चल सकती। वे 1984 और 2002 के दंगों का हवाला देते हुए कहते हैं कि अगर एक अधिकारी कुछ घंटों में हिंसा रोक सकता है, तो हफ्तों तक चलने वाली हिंसा सवाल खड़े करती है।
वे बुलडोज़र कार्रवाई को ‘तुरंत इंसाफ़’ कहे जाने पर भी सवाल उठाते हैं और इसे क़ानूनी प्रक्रिया का खुला उल्लंघन मानते हैं। मंदर के मुताबिक़, राजनीति, प्रशासन, न्यायपालिका, मीडिया और समाज—सबने मिलकर नफ़रत के बढ़ते माहौल को रोकने में विफलता दिखाई है। इसके बावजूद वे उम्मीद नहीं छोड़ते। उनका कहना है कि देश की बहुसंख्यक आबादी नफ़रत के साथ खड़ी नहीं है और अंततः लोकतंत्र, इंसानियत और मोहब्बत ही जीतेंगे—बशर्ते नागरिक चुप न रहें और सवाल पूछते रहें।
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