शेयर बाजार में जारी गिरावट के बीच शुगर कंपनियों के शेयरों में जोरदार तेजी देखने को मिली, जहां धामपुर शुगर मिल्स, डालमिया भारत शुगर एंड इंडस्ट्रीज, द्वारिकेश शुगर इंडस्ट्रीज, श्री रेणुका शुगर, बजाज हिंदुस्तान शुगर और प्राज इंडस्ट्रीज के शेयरों में 2% से 12% तक की बढ़त दर्ज की गई। इस तेजी के पीछे मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई बढ़ोतरी को माना जा रहा है, जिससे इस क्षेत्र में निवेशकों की रुचि बढ़ी है। बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के कारण एथेनॉल से जुड़े कारोबार को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है। इसके चलते शुगर कंपनियों के मुनाफे में सुधार की संभावना जताई जा रही है, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।
युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है, जहां ब्रेंट क्रूड करीब 3% उछलकर 116.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। हाल के समय में ब्रेंट क्रूड का उच्चतम स्तर 119 डॉलर रहा है, जबकि अमेरिकी कच्चा तेल (डब्ल्यूटीआई) भी बढ़कर 96 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है। वैश्विक सप्लाई को लेकर अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनावों ने कीमतों को सहारा दिया है। इसके चलते ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा है और इसका असर अन्य क्षेत्रों पर भी देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव जारी रहा तो कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है। वहीं, बढ़ती कीमतों का असर महंगाई और उत्पादन लागत पर भी पड़ सकता है।
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शुगर कंपनियों को एथेनॉल बूस्ट, बढ़ती कीमतों से मजबूत संभावनाएं
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना है, जो सीधे तौर पर शुगर कंपनियों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। कई कंपनियों ने बड़े स्तर पर इथेनॉल का उत्पादन शुरू कर दिया है और अब वे केवल चीनी पर निर्भर नहीं रहीं, बल्कि ईंधन मिश्रण के लिए इथेनॉल पर भी ध्यान दे रही हैं। बढ़ती तेल कीमतों के बीच इथेनॉल की मांग और बढ़ सकती है, जिससे कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के संकेत मिल रहे हैं। इसी उम्मीद के चलते इस सेक्टर के शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है और बाजार में तेजी देखने को मिल रही है। सरकार की एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति भी इस रुझान को मजबूती दे रही है। आने वाले समय में यह सेगमेंट शुगर उद्योग की कमाई का बड़ा स्रोत बन सकता है।
दुनिया में सबसे अधिक चीनी उत्पादन करने वाले ब्राजील में उत्पादन घटने का अनुमान है, जहां वित्त वर्ष 2026-27 में यह करीब 40.30 मिलियन टन रहने की संभावना है, जो पहले लगभग 43.50 मिलियन टन था। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति में इस कमी से चीनी की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसका सीधा फायदा भारतीय निर्यातकों को मिलने की उम्मीद है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ सकती है। इससे भारतीय शुगर कंपनियों की आय में भी सुधार देखने को मिल सकता है। साथ ही, निर्यात बढ़ने से घरेलू उद्योग को अतिरिक्त समर्थन मिलने की संभावना है।
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