हिमाचल प्रदेश में सरकारी आवास को लेकर एक नया प्रशासनिक विवाद सामने आया है। वरिष्ठ DIG पुलिस अधिकारी संजीव गांधी को सरकारी आवास खाली नहीं करने पर नोटिस जारी किया गया है। विभाग ने उन्हें लगभग ₹1.80 लाख जमा करने का निर्देश देते हुए सख्त चेतावनी भी दी है। अधिकारियों ने स्पष्ट कहा कि निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं होने पर वेतन से वसूली की जाएगी। इस मामले ने प्रशासनिक हलकों में नई चर्चा शुरू कर दी है और सरकारी नियमों के पालन पर सवाल उठाए हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार संजीव गांधी ने 7 फरवरी को शिमला एसपी का पद छोड़ दिया था। पद छोड़ने के बाद उन्हें सरकारी आवास में सीमित समय तक रहने की अनुमति दी गई थी। हालांकि निर्धारित समय समाप्त होने के बाद भी उन्होंने सरकारी आवास खाली नहीं किया है।
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सरकारी आवास खाली नहीं करने पर DIG संजीव गांधी को नोटिस जारी
विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार संजीव गांधी को 7 मार्च तक सरकारी आवास में रहने की विशेष अनुमति मिली थी। तय अवधि समाप्त होने के बाद संबंधित विभाग ने उन्हें आवास खाली करने के निर्देश जारी किए थे। इसके बावजूद अधिकारी अभी भी उसी सरकारी आवास में रह रहे हैं, जिससे विवाद और बढ़ गया। प्रशासनिक अधिकारियों ने इस मामले को नियमों के उल्लंघन से जुड़ा गंभीर विषय माना है। विभाग का कहना है कि सरकारी आवास सीमित संख्या में उपलब्ध हैं और अन्य अधिकारियों को भी जरूरत रहती है। इसलिए समयसीमा समाप्त होने के बाद आवास खाली करना अनिवार्य माना जाता है। संबंधित विभाग ने नोटिस में बकाया राशि जमा करने के साथ तुरंत आवास खाली करने का निर्देश भी दिया है। मामले को लेकर विभागीय स्तर पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
दूसरी तरफ संजीव गांधी ने अपने पक्ष में कई प्रशासनिक कारणों का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से उन्हें नया सरकारी आवास उपलब्ध नहीं कराया गया। उन्होंने दावा किया कि वैकल्पिक अकोमोडेशन नहीं मिलने के कारण उन्हें वर्तमान सरकारी आवास में रहना पड़ रहा है। अधिकारी का कहना है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के अचानक आवास खाली करना उनके लिए संभव नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने संबंधित विभागों को अपनी स्थिति के बारे में पहले ही जानकारी दे दी थी। सूत्रों के अनुसार संजीव गांधी ने प्रशासन से नया आवास उपलब्ध कराने का अनुरोध भी किया था। हालांकि अब तक उन्हें किसी नई सरकारी सुविधा का आवंटन नहीं मिला है। इसी कारण यह विवाद लगातार प्रशासनिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
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विभाग ने ₹1.80 लाख वसूली की चेतावनी दी, वेतन कटौती की तैयारी
सरकारी आवास विवाद को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ अधिकारियों का मानना है कि नियम सभी कर्मचारियों और अधिकारियों पर समान रूप से लागू होने चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग यह भी मान रहे हैं कि वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। इस पूरे मामले ने सरकारी आवास आवंटन प्रक्रिया की व्यवस्थाओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि लंबे समय तक सरकारी आवास रोके जाने से अन्य अधिकारियों को परेशानी होती है। कई कर्मचारी लंबे समय से सरकारी क्वार्टर के आवंटन का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में समयसीमा समाप्त होने के बाद आवास खाली न करना विवाद का मुख्य कारण बन गया है। प्रशासन इस मामले का समाधान जल्द निकालने की कोशिश कर रहा है।
फिलहाल विभाग ने संजीव गांधी को जारी नोटिस में बकाया राशि जमा करने की अंतिम चेतावनी दी है। नोटिस में कहा गया है कि भुगतान नहीं करने पर संबंधित राशि वेतन से काटी जा सकती है। प्रशासनिक अधिकारियों ने मामले को नियमों और सरकारी प्रक्रियाओं के अनुसार निपटाने की बात कही है। दूसरी ओर संजीव गांधी अब भी वैकल्पिक सरकारी आवास मिलने का इंतजार कर रहे हैं। मामले ने हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र में सरकारी आवास व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। कई लोग इस विवाद को सरकारी नियमों और मानवीय परिस्थितियों के बीच संतुलन का मामला मान रहे हैं। आने वाले दिनों में विभाग की अगली कार्रवाई और प्रशासनिक फैसलों पर सभी की नजर बनी हुई है। फिलहाल यह विवाद प्रदेश के प्रशासनिक हलकों में लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।
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