आसमान में एक रहस्यमयी “बरमूडा ट्रायंगल” मौजूद है। वैज्ञानिक इसे दक्षिण अटलांटिक एनोमली कहते हैं। यह पृथ्वी के दक्षिण अटलांटिक के ऊपर बना कमजोर मैग्नेटिक ज़ोन है। यहां पहुंचते ही कई सैटेलाइट सिस्टम प्रभावित हो जाते हैं। कभी-कभी उपग्रह पूरी तरह निष्क्रिय भी हो जाते हैं। क्योंकि इस इलाके में पृथ्वी की चुंबकीय ढाल कमजोर पड़ जाती है। इसलिए ऊर्जावान अंतरिक्षीय कण सीधे इलेक्ट्रॉनिक्स पर असर डालते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार यह क्षेत्र लगातार फैल रहा है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के स्वार्म मिशन ने अहम डेटा जुटाया है। इसके अलावा दस साल के विश्लेषण ने नई चिंता बढ़ाई है। 2014 के बाद इसका आकार तेजी से बढ़ा है। अब यह लगभग महाद्वीपीय यूरोप के आधे जितना माना जाता है। इसलिए वैज्ञानिक इसे भविष्य के मिशनों के लिए खतरा बताते हैं।
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आसमान में अंतरिक्ष मिशनों पर मंडराया खतरा
दक्षिण अटलांटिक एनोमली की पहचान पहली बार 1800 के दशक में हुई थी। लेकिन आज भी यह वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। मार्च 2016 में जापान की हितोमी एक्स-रे वेधशाला यहां से गुजरते समय नष्ट हो गई। इससे करीब 273 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। वहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि यह इलाका लंबी अवधि के स्पेस मिशनों में बाधा डाल सकता है।
असल में पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड बाहरी कोर के पिघले लोहे से बनता है। यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शील्ड हमें कॉस्मिक रेडिएशन से बचाती है। हालांकि स्वार्म मिशन ने नई कमजोरी भी दर्ज की है। 2020 के बाद अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी अटलांटिक में गिरावट तेज हुई है। अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिक क्रिस फिनले ने भी बदलाव की पुष्टि की है। उनके अनुसार SAA एक स्थिर बिंदु नहीं है। बल्कि यह अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह से बदल रहा है। वैज्ञानिकों ने देखा कि कुछ जगहों पर मैग्नेटिक फील्ड लाइन्स उल्टी दिशा में जा रही हैं। इसलिए इसे असामान्य बदलाव माना जा रहा है। आने वाले समय में इस क्षेत्र की निगरानी जरूरी होगी। क्योंकि इसका विस्तार वैश्विक सैटेलाइट सुरक्षा के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है।
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