पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर टोल वसूली की घोषणा कर दी है, जिससे वैश्विक समुद्री व्यापार और जियो-पॉलिटिकल समीकरणों में नई हलचल पैदा हो गई है। ईरान ने खुद को होर्मुज का “गेटकीपर” घोषित करते हुए कहा है कि यहां से गुजरने वाले तेल टैंकरों और जहाजों को अब उसकी सरकार को निर्धारित शुल्क चुकाना होगा।
ईरान की संसद ने “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मैनेजमेंट प्लान” पारित कर इस कदम को कानूनी आधार देने की कोशिश की है। ईरान का दावा है कि होर्मुज उसके क्षेत्रीय और संप्रभु जल क्षेत्र में आता है, इसलिए वह यहां सुरक्षा, निगरानी और पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी निभाता है। इसी आधार पर वह जहाजों से “सुरक्षा शुल्क” या “ट्रांजिट शुल्क” लेने को जायज ठहराता है। ईरान ने संयुक्त राष्ट्र को भी पत्र लिखकर कहा है कि उसका कदम अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में है।
होर्मुज पर ईरान का नया दावा और टोल वसूली की घोषणा
हालांकि समुद्री कानून के जानकार इस दलील को चुनौती देते हैं। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के आर्टिकल 37-44 के तहत अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों में “ट्रांजिट पैसेज” का अधिकार लागू होता है। इसके अनुसार, जहाज बिना रोक-टोक और बिना किसी शुल्क के लगातार गुजर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज इसी श्रेणी में आता है, जहां टोल वसूली का कोई वैध आधार नहीं है।
ईरान का तर्क है कि उसने UNCLOS पर हस्ताक्षर तो किए थे, लेकिन उसे औपचारिक रूप से मंजूरी नहीं दी। इसलिए वह “ट्रांजिट पैसेज” की बजाय “इनॉसेंट पैसेज” के नियम को मानता है। इनॉसेंट पैसेज के तहत तटीय देश अपने क्षेत्रीय जल में गुजरने वाले जहाजों पर कुछ नियंत्रण रख सकता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले स्ट्रेट में ट्रांजिट पैसेज का अधिकार प्राथमिकता रखता है और वहां टोल नहीं लगाया जा सकता।
स्वेज और पनामा का मॉडल होर्मुज पर क्यों लागू नहीं
दुनिया में कुछ समुद्री मार्गों पर शुल्क जरूर लिया जाता है, लेकिन वे मानव-निर्मित नहरें हैं। उदाहरण के तौर पर मिस्र की स्वेज नहर, पनामा नहर और जर्मनी की कील नहर पर जहाजों से नियमित टोल वसूला जाता है क्योंकि इनका निर्माण और रखरखाव संबंधित देशों ने किया है। इसके विपरीत, होर्मुज एक प्राकृतिक जलडमरूमध्य है, जिस पर किसी देश का पूर्ण मालिकाना हक मान्य नहीं है।
ईरान के इस फैसले से क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। यदि टोल वसूली लागू होती है, तो यह वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कानून दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस कदम पर कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्या होर्मुज नया जियो-पॉलिटिकल फ्लैशपॉइंट बनता है।
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