अमेरिका ईरान पर हमले की तैयारी पूरी कर चुका है, लेकिन सऊदी अरब, UAE और कतर ने साफ कर दिया है कि वे न तो अपना एयरस्पेस देंगे और न ही लॉन्चपैड बनने को तैयार हैं। खाड़ी के इन बड़े मुस्लिम देशों के पीछे हटने से ट्रंप प्रशासन की रणनीति को बड़ा झटका लगा है और मिडिल ईस्ट में तनाव और गहरा गया है।
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई को सत्ता से हटाने तक की धमकियों के बीच अमेरिका खुद को एक बार फिर क्षेत्र में अकेला पाता दिख रहा है। ऐसे हालात में जॉर्डन अमेरिका का संभावित रणनीतिक साझेदार बनकर उभर रहा है। अब तक जॉर्डन ने सार्वजनिक तौर पर यह नहीं कहा है कि वह अमेरिका को अपना एयरस्पेस नहीं देगा, इसी वजह से उसे ईरान पर संभावित हमले में अमेरिका का सबसे अहम सहयोगी माना जा रहा है।
हथियार सौदों के बावजूद खाड़ी देश सैन्य कार्रवाई से दूर
मिडिल ईस्ट में अमेरिका के आठ स्थायी सैन्य बेस हैं, जिनमें बहरीन, मिस्र, इराक, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, UAE और जॉर्डन शामिल हैं। जॉर्डन में मौजूद मुवफ्फाक साल्टी एयर बेस पर अमेरिका ने भारी हथियार, सैन्य संसाधन और एडवांस डिफेंस सिस्टम तैनात कर रखे हैं। हाल के दिनों में यहां अमेरिकी F-15 फाइटर जेट्स की गतिविधियां तेज हुई हैं। पैट्रियट और THAAD जैसे डिफेंस सिस्टम भी पहले से तैनात हैं। फिलहाल जॉर्डन में करीब 4,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं, जिससे संकेत मिलते हैं कि खाड़ी देशों के इनकार की स्थिति में अमेरिका जॉर्डन से सैन्य समर्थन ले सकता है।
दरअसल, खाड़ी देशों ने अप्रैल 2025 में ही अमेरिका को साफ संदेश दे दिया था कि वे ईरान पर हमले के लिए अपना एयरस्पेस नहीं देंगे। उन्होंने रिफ्यूलिंग और रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए भी एयरस्पेस के इस्तेमाल से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप मई 2025 में खाड़ी देशों के दौरे पर पहुंचे और अपने सहयोगियों को मनाने की कोशिश की, लेकिन एयरस्पेस के मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी। हालांकि, इस दौरान कतर, UAE और सऊदी अरब के साथ हथियारों और रणनीतिक समझौतों पर बातचीत जरूर हुई।
खाड़ी मुल्कों का इनकार लेकिन ट्रंप फिर भी मुरीद
ट्रंप प्रशासन ने कई लंबे समय से अटकी हथियार डील्स को मंजूरी दी। कतर को MQ-9 रीपर ड्रोन खरीदने की इजाजत मिली, जबकि सऊदी अरब को ऐसे हथियार सिस्टम दिए गए, जो बिना गाइडेड रॉकेट्स को प्रिसिजन रॉकेट्स में बदल सकते हैं। इसके बावजूद खाड़ी देशों ने ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाए रखी।
खाड़ी देशों के इनकार के बाद अमेरिका को अपने वैकल्पिक रणनीतिक एयरबेस डियागो गार्शिया का सहारा लेना पड़ा, जहां से उसने 22 जून 2025 को ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर हमले किए। इसके बाद से ही अमेरिका और ईरान जंग के मुहाने पर खड़े नजर आ रहे हैं।
ईरान में प्रदर्शन का दौर और अमेरिका के लिए मौका
इसी बीच ईरान में आर्थिक और सैन्य संकट के बीच बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हो गए। आयतुल्ला अली खामेनेई को सत्ता से हटाने की मांग तेज हुई, जिसे दबाने के लिए ईरानी शासन ने भारी बल प्रयोग किया। अमेरिका और इजरायल इन प्रदर्शनों को खामेनेई को सत्ता से बेदखल करने के मौके के तौर पर देख रहे हैं। यही वजह है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने खुले तौर पर धमकियां देना शुरू कर दिया।
हफ्तों तक बयानबाजी और चेतावनियों के बाद ट्रंप प्रशासन हमले के बेहद करीब पहुंच गया था, लेकिन आखिरी वक्त पर फैसला टल गया। इसकी सबसे बड़ी वजह यही रही कि खाड़ी के बड़े सहयोगी देशों ने अपने एयरस्पेस के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी। यह रुख ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ा रणनीतिक झटका साबित हुआ।
अमेरिका चाहता था कि यमन में हूती विद्रोहियों पर किए गए बड़े हवाई हमलों को ताकत के प्रदर्शन के तौर पर इस्तेमाल कर ईरान को परमाणु समझौते पर बातचीत की मेज तक लाया जाए। लेकिन अब जब ईरान को यह साफ हो गया है कि अरब देश अमेरिका के साथ नहीं हैं, उसने बातचीत को और लंबा खींचने की रणनीति अपनानी शुरू कर दी है।
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