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    किडनी रैकेट

    कानपुर में सामने आया किडनी रैकेट का काला सच एक बड़े संगठित अपराध की ओर इशारा करता है। इस मामले में अस्पताल, दलाल और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका सामने आई। 30 मार्च की रात हुए खुलासे ने पूरे सिस्टम को हिला दिया। शुरुआत में यह मामला छोटा लगा, लेकिन बाद में इसका दायरा बढ़ता गया। हालांकि, जांच आगे बढ़ी तो कई राज्यों तक कनेक्शन मिले। गरीब युवाओं को पैसे का लालच देकर फंसाया जाता था। वहीं, गंभीर मरीजों को जल्दी इलाज का भरोसा दिया जाता था। कुल मिलाकर, इस मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी खामियां उजागर की हैं।

    कैसे हुआ खुलासा

    इस मामले की शुरुआत बिहार के समस्तीपुर निवासी आयुष से हुई। उसे टेलीग्राम के जरिए संपर्क किया गया। उसे किडनी देने के बदले 10 लाख रुपये का लालच दिया गया। इसके बाद उसे कानपुर बुलाया गया। आहूजा अस्पताल में उसकी सर्जरी की गई। लेकिन, बाद में उसे तय रकम से कम पैसे दिए गए। इसी वजह से विवाद हुआ और उसने पुलिस को फोन किया।

    इसके बाद, पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू की। पहले से कुछ इनपुट मिल रहे थे, इसलिए टीम सतर्क थी। करीब 22 दिन तक निगरानी की गई। फिर, क्राइम ब्रांच और एसओजी ने छापेमारी की। आहूजा, प्रिया और मेडलाइफ अस्पतालों की जांच हुई। वहां कोई वैध दस्तावेज नहीं मिला। इसलिए, मामला और गंभीर हो गया।

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    कैसे चलता था नेटवर्क

    यह रैकेट बहुत सुनियोजित तरीके से काम करता था। सबसे पहले गरीब युवाओं को निशाना बनाया जाता था। उन्हें जल्दी पैसे का लालच दिया जाता था। दूसरी ओर, मरीजों को तुरंत ट्रांसप्लांट का भरोसा दिया जाता था। इसके बाद फर्जी दस्तावेज बनाए जाते थे। इन कागजों में रिश्तेदारी दिखाई जाती थी। इस तरह, कानून से बचने की कोशिश की जाती थी।

    ऑपरेशन के बाद डोनर और मरीज को अलग-अलग जगह भेजा जाता था। ताकि पूरा नेटवर्क एक साथ सामने न आए। डॉक्टरों की टीम बाहर से बुलाई जाती थी। इससे पहचान छुपी रहती थी। इसके अलावा, दलाल दोनों पक्षों को जोड़ते थे। वही पूरा सौदा तय करते थे। नतीजतन, यह नेटवर्क लगातार चलता रहता था।

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    मुनाफे का खेल और शोषण

    इस रैकेट में पैसों का बड़ा खेल चलता था। डोनर को 8 से 10 लाख का वादा किया जाता था। लेकिन, कई बार उसे केवल 4 से 5 लाख ही मिलते थे। वहीं, मरीजों से 60 से 80 लाख तक लिए जाते थे। इससे भारी मुनाफा कमाया जाता था। इस कारण, यह अवैध कारोबार बढ़ता रहता है। इसके अलावा, गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाया जाता है। ऑपरेशन के बाद उन्हें सही इलाज नहीं मिलता। उनकी हालत बिगड़ती जाती है। दूसरी ओर, मरीज जान बचाने के लिए पैसे देते हैं। यह पूरा सिस्टम इंसानियत को नजरअंदाज करता है। आखिरकार, मुनाफा ही सबसे बड़ा मकसद बन जाता है।

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