अरविंद केजरीवाल ने X पर एक वीडियो पोस्ट कर कहा कि उन्हें जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही। उन्होंने कहा कि अपनी अंतरात्मा की आवाज़, गांधीवादी सिद्धांतों और सत्याग्रह की भावना के तहत उन्होंने इस मामले में अदालत में पेश न होने और कोई दलील न रखने का फैसला किया है।
उनके इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या उनका कदम अदालत की अवमानना के दायरे में आ सकता है। जानकारों का कहना है कि यदि इसे अवमानना माना गया, तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। वहीं, अगर ऐसा नहीं भी होता, तो भी इस रुख से उन्हें क्या हासिल होगा और इसका न्याय प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा, इस पर बहस जारी है।
यह मामला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक हाई कोर्ट जज और एक पूर्व मुख्यमंत्री व राष्ट्रीय पार्टी के प्रमुख के बीच टकराव की स्थिति दिख रही है। केजरीवाल ने कहा कि उन्होंने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि उन्हें लगा कि अदालत की कार्यवाही उस सिद्धांत पर खरी नहीं उतर रही, जिसमें न्याय केवल होना ही नहीं, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।
“केजरीवाल के बयान पर उठा सवाल: क्या यह अवमानना है?”
फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने कहा कि अरविंद केजरीवाल का अदालत में पेश न होने का फैसला सीधे तौर पर अदालत की अवमानना के दायरे में लाना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि जज बदलने के लिए केजरीवाल ने जो दलीलें दीं, उन्हें कोई पेशेवर वकील बेहतर तरीके से रख सकता था। उनके मुताबिक, इस मामले में जज की टिप्पणियों के बाद विवाद और बढ़ गया।
मुस्तफ़ा ने यह भी कहा कि अगर किसी दूसरे जज ने सुनवाई की होती और राहत नहीं मिलती, तो केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट जा सकते थे। उन्होंने जोड़ा कि न्याय केवल होना ही नहीं, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। उनका मानना है कि कुछ वीडियो सामने आने के बाद अगर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा खुद को मामले से अलग कर लेतीं, तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठते।
वहीं, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने केजरीवाल के रुख का समर्थन किया। उन्होंने X पर केजरीवाल की चिट्ठी साझा करते हुए कहा कि CBI की अपील में शामिल न होने का उनका फैसला सही और उचित है।
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