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    डॉ. विकास दिव्यकीर्ति: अंबेडकर न होते तो सवर्ण महिलाओं की स्थिति भी सीमित होती

    अंबेडकर

    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर देशभर में जारी विरोध के बीच दृष्टि आईएएस के संस्थापक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति ने इनका समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि ये नियम 2012 के प्रावधानों की तुलना में अधिक प्रभावी हैं और इनमें किसी भी तरह के भेदभाव की गुंजाइश नहीं है। उन्होंने इन नियमों के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों पर सवाल उठाते हुए वाइस चांसलरों की भूमिका पर भी संदेह जताया।

    पॉडकास्ट में आरक्षण और अंबेडकर के योगदान पर बोले विकास दिव्यकीर्ति

    एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश के साथ एक हालिया पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान विकास दिव्यकीर्ति ने आरक्षण, जातिगत भेदभाव और महिलाओं के अधिकारों पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर के योगदान को पूरे समाज के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि अगर अंबेडकर नहीं होते तो महिलाओं, खासकर उच्च जातियों की महिलाओं को भी कई संवैधानिक अधिकार नहीं मिल पाते, जो हिंदू कोड बिल जैसे सुधारों के जरिए सुनिश्चित हुए।

    एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश के साथ एक पॉडकास्ट के दौरान, जब सवर्ण छात्रों के बीच डॉ. बी.आर. अंबेडकर को लेकर नकारात्मक धारणा से जुड़े एक लेख का जिक्र किया गया, तो दृष्टि आईएएस के संस्थापक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि उन्होंने हाल के वर्षों में सवर्ण समाज, खासकर महिलाओं के बीच भी ऐसी सोच को बढ़ते हुए देखा है। उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति चिंताजनक है, क्योंकि अंबेडकर का योगदान पूरे समाज के लिए था।

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    हिंदू समाज में एकरूप कानून लाने की पहल: हिंदू कोड बिल

    विकास दिव्यकीर्ति ने हिंदू कोड बिल का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू समाज में समान नागरिक अधिकारों और महिलाओं को मिले कई कानूनी अधिकार डॉ. अंबेडकर की पहल का परिणाम हैं। उन्होंने कहा कि 1954-55 में पारित चार कानूनों के जरिए हिंदू महिलाओं को अधिकार मिले और इन सुधारों के विरोध के चलते अंबेडकर ने इस्तीफा तक दे दिया था, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ये कानून लागू करने पड़े।

    हिंदू समाज में सुधार के उद्देश्य से लाया गया हिंदू कोड बिल आधुनिक भारत के कानूनी इतिहास का एक अहम अध्याय माना जाता है। इसकी अवधारणा आज़ादी से पहले रखी गई थी, लेकिन स्वतंत्र भारत में इसे आकार देने और आगे बढ़ाने का श्रेय देश के पहले कानून मंत्री डॉ. बी.आर. अंबेडकर और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दिया जाता है। 1941 में गठित बी.एन. राव समिति ने हिंदुओं के लिए एक समान कानून का खाका तैयार किया, जिसे आज़ादी के बाद अंबेडकर ने आगे बढ़ाया।

    इस विधेयक का उद्देश्य हिंदू विवाह, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और संरक्षण से जुड़े कानूनों में व्यापक सुधार लाना था, खासकर महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए। इसके तहत महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार, तलाक का कानूनी प्रावधान और बहुविवाह पर रोक जैसे बदलाव प्रस्तावित किए गए। हालांकि, संसद और समाज के कुछ वर्गों के तीव्र विरोध के चलते विधेयक पारित नहीं हो सका और 1951 में अंबेडकर ने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद इसके प्रावधानों को 1954-55 में अलग-अलग कानूनों के रूप में लागू किया गया।

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