कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में हर्ष सिंह ने भारत को गोल्ड दिलाकर इतिहास रच दिया। पुरुषों के 60 किलोग्राम जूडो फाइनल में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ काट्ज को 10-0 के बड़े अंतर से हराया। हर्ष ने मुकाबले की शुरुआत से ही आक्रामक खेल दिखाया और पूरे मैच में अपने प्रतिद्वंद्वी को कोई मौका नहीं दिया। उनकी सटीक तकनीक और मजबूत डिफेंस के सामने ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एक भी अंक नहीं बना सके। जीत के बाद हर्ष ने दोनों हाथ उठाकर अपनी खुशी जाहिर की, जबकि भारतीय दल ने तालियों के साथ इस यादगार जीत का स्वागत किया।
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फाइनल में दिखाया दमदार प्रदर्शन
24 मई 2003 को जन्मे हर्ष सिंह ने दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के काकरोला गांव में एक दिहाड़ी मजदूर परिवार में बचपन बिताया। बचपन में उनका शरीर बेहद दुबला-पतला था, इसलिए आसपास के लोग उन्हें “खजूर” कहकर चिढ़ाते थे। हालांकि, उन्होंने कभी इन तानों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। पांच साल की उम्र में दोस्तों को विक्ट्री जूडो अकादमी में अभ्यास करते देखकर उन्होंने भी जूडो सीखना शुरू किया और उसी दिन से अपने सपनों को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए।
हर्ष सिंह ने जूनियर और सीनियर स्तर की राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार शानदार प्रदर्शन किया और अपनी अलग पहचान बनाई। नेशनल रैंकिंग टूर्नामेंट और चयन ट्रायल में बेहतरीन नतीजे हासिल करने के बाद उन्हें भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। उन्होंने टोक्यो ग्रैंड स्लैम, एशियन चैंपियनशिप और कई आईजेएफ वर्ल्ड टूर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल किया। इसी अनुभव ने उन्हें ग्लासगो में बड़े मंच पर आत्मविश्वास के साथ खेलने में मदद की।
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पांच साल की उम्र में शुरू हुआ सफर
हर्ष सिंह कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में स्वर्ण पदक जीतने वाले दूसरे भारतीय जूडो खिलाड़ी बने। इससे पहले महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में अस्मिता डे ने कनाडा की हेइडी क्वाच को हराकर भारत को पहला गोल्ड दिलाया था। हर्ष की जीत के बाद जूडो में भारत का प्रदर्शन और मजबूत हुआ। उनके स्वर्ण पदक के साथ भारत की कुल पदक संख्या 19 पहुंच गई, जिसमें पांच गोल्ड, 10 सिल्वर और चार ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं।
कभी “खजूर” कहकर चिढ़ाया जाने वाला हर्ष सिंह आज देश के लिए “गोल्डन बॉय” बन चुके हैं। उन्होंने अपनी मेहनत, अनुशासन और संघर्ष के दम पर हर चुनौती का सामना किया और आलोचनाओं को अपनी ताकत में बदल दिया। उनकी सफलता यह साबित करती है कि इंसान की पहचान दूसरों की बातों से नहीं, बल्कि उसके प्रदर्शन और उपलब्धियों से बनती है। हर्ष की यह जीत देश के युवा खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा का बड़ा स्रोत बन गई है।
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