राजधानी के स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में गुरुवार को भगवान स्वामीनारायण (नीलकंठ वर्णी) की 108 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा का प्राण-प्रतिष्ठा समारोह वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। बीएपीएस के अनुसार, यह दुनिया की सबसे ऊंची ‘एक पैर पर खड़ी’ ध्यानमग्न प्रतिमा है।इस प्रतिमा के स्थापित होने के बाद अक्षरधाम मंदिर का आकर्षण और भी बढ़ गया है।
समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और आध्यात्मिक माहौल देखने को मिला। इस आयोजन ने देश-विदेश में भक्तों का ध्यान आकर्षित किया है।
भगवान स्वामीनारायण के बाल तपस्वी रूप नीलकंठ वर्णी को दर्शाती यह प्रतिमा वैराग्य, तप और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक मानी जा रही है। समारोह में बीएपीएस के प्रमुख महंत स्वामी महाराज की उपस्थिति में वैदिक अनुष्ठान संपन्न हुए। मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहां पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे हजारों भक्तों ने भजन, मंत्रोच्चारण और सामूहिक प्रार्थनाओं के बीच इस ऐतिहासिक पल को देखा। पूरे आयोजन के दौरान भक्ति और श्रद्धा का माहौल बना रहा।
इस अवसर पर मंदिर परिसर को भव्य रूप से सजाया गया, जिससे आयोजन की भव्यता और बढ़ गई।
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ऊंची आध्यात्मिक ऊर्जा: 300 संतों की मौजूदगी में भव्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह सम्पन्न
आयोजन में देश-विदेश से आए करीब 300 संतों ने भाग लिया। मंदिर संस्था के अनुसार, दो दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत बुधवार को वैश्विक शांति यज्ञ के साथ हुई, जिसमें वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच विश्व शांति की प्रार्थना की गई। गुरुवार को मुख्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह संपन्न हुआ, जहां वैदिक परंपराओं के अनुसार प्रतिमा का विधिवत स्थापना संस्कार किया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति ने आयोजन को भव्य स्वरूप दिया। पूरे कार्यक्रम में आध्यात्मिक ऊर्जा और धार्मिक उत्साह का माहौल देखने को मिला।
प्राण-प्रतिष्ठा के बाद महंत स्वामी महाराज ने कहा कि यह प्रतिमा विश्व को शांति और सद्गुणों का संदेश देगी। उन्होंने विश्वास जताया कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक प्रेरणा और आंतरिक शांति का अनुभव होगा। समिति के अनुसार, यह प्रतिमा पुलहाश्रम में नीलकंठ वर्णी के रूप में भगवान स्वामीनारायण की चार महीने तक एक पैर पर खड़े होकर की गई कठोर तपस्या की स्मृति को दर्शाती है। यह आज भी त्याग, निर्भयता और भक्ति के आदर्शों का प्रतीक बनकर प्रेरणा देती है।इस प्रतिमा के माध्यम से नई पीढ़ी को आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया गया है। मंदिर प्रबंधन को उम्मीद है कि यह स्थल भक्तों के लिए एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बनेगा।
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